7 साल की रिसर्च में हड़िया में मिले लैक्टोबैसिलस और एंटी-ऑक्सीडेंट, मिलावटी पेय से नुकसान की चेतावनी


जमशेदपुर : डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय की शोधकर्ता डॉ. सुकन्या हेंब्रम ने हड़िया पर सात साल लंबे शोध में इसके वैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन किया है। वर्ष 2019 में शुरू हुआ यह शोध अगस्त 2026 में पूरा हुआ, जिसमें रांची, खूंटी, गुमला और रामगढ़ जिलों को शामिल किया गया। पीएचडी थीसिस के तहत किए गए अध्ययन में अलग-अलग क्षेत्रों से चावल जुटाकर कुल 12 किलोग्राम चावल से माइक्रोबायोलॉजी लैब में हड़िया तैयार की गई। शोध में अरवा, उसना, करहनी और मडुवा जैसी अलग-अलग किस्मों के अनुसार हड़िया के स्वाद और गुणों में अंतर पाया गया।


शोध के मुताबिक, हड़िया तैयार करने में चावल पकाने और सुखाने के बाद जंगलों की प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से बने ‘रानु’ को मिलाया जाता है। इसे दो से चार दिनों तक ढककर रखने पर प्राकृतिक किण्वन होता है। लैब परीक्षण में हड़िया और उसके पानी में लैक्टोबैसिलस बैक्टीरिया और एंटी-ऑक्सीडेंट पाए गए, जिन्हें पेट के स्वास्थ्य और पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद बताया गया है। सही तरीके से बनी हड़िया से पीलिया जैसी बीमारियों में राहत मिलने की पारंपरिक मान्यता का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, शोध में चेतावनी दी गई है कि बाजार में मिलने वाली मिलावटी हड़िया में इस्तेमाल होने वाले रसायन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं।
डॉ. सुकन्या ने करीब 200 पन्नों की थीसिस में हड़िया से जुड़े सूक्ष्मजीवों और पारंपरिक ज्ञान को दर्ज किया है। शोध में हड़िया को साधारण शराब से अलग बताते हुए कहा गया है कि शराब डिस्टिलेशन और औद्योगिक प्रक्रियाओं से तैयार होती है, जबकि पारंपरिक हड़िया प्राकृतिक अनाज और जड़ी-बूटियों से बनाई जाती है। आदिवासी समाज में इसका उपयोग पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक आयोजनों में प्रसाद के रूप में भी होता है। शोधकर्ता के अनुसार, हड़िया में इस्तेमाल होने वाली जड़ी-बूटियों पर आगे और शोध की आवश्यकता है।


