आजादी के 78 साल बाद भी अंधेरे में डूबा महुआडांड़ का गांशा गांव, चंपा पंचायत के ग्रामीण बोले- “बिजली आई तो समझेंगे विकास हुआ

महुआडांड़, लातेहार। “डिजिटल इंडिया” और “हर घर बिजली” के दावों के बीच महुआडांड़ प्रखंड की चंपा पंचायत का गांशा गांव आज भी 18वीं सदी का जीवन जी रहा है। आजादी के 78 साल बाद भी इस गांव के 30 से ज्यादा घरों में बिजली का एक बल्ब तक नहीं जला है।

खंभे हैं, करंट नहीं
ग्रामीणों ने बताया कि 5 साल पहले गांव में बिजली के खंभे तो गाड़ दिए गए, पर आज तक बल्ब तक नही जले शाम ढलते ही पूरा गांव घुप अंधेरे में डूब जाता है।
“बच्चों का भविष्य अंधेरे में”
गांव के सुनील उरांव ने कहा, हमारे बच्चे लालटेन और ढिबरी की रोशनी में पढ़ते हैं। मोबाइल चार्ज करने 3 किमी दूर बाजार जाना पड़ता है। बरसात में सांप-बिच्छू का डर अलग। बिजली विभाग में दर्जनों बार आवेदन दिया, हर बार सिर्फ आश्वासन मिला।
महिलाओं का दर्द: आटा चक्की तक नहीं
गांव की सुनीता देवी बताती हैं,गेहूं पीसने 3 किमी महुआडांड़ जाना पड़ता है। रात में बीमार पड़ जाए तो टॉर्च के सहारे इलाज। सरकार कहती है बेटी पढ़ाओ, पर बिना बिजली बेटी कैसे पढ़े
युवा पलायन को मजबूर
बिजली न होने से गांव में कोई लघु उद्योग नहीं लग पाया। सिंचाई के लिए डीजल पंप पर निर्भरता है। रोजगार के अभाव में युवा रांची-पलामू पलायन कर रहे हैं। ग्रामीण जगदीश लोहरा ने कहा, बिजली आ जाए तो आटा चक्की, वेल्डिंग दुकान खोल लें। पर लगता है हमारा नंबर कभी नहीं आएगा।


