MMDR एक्ट पर रघुवर दास का हमला, हेमंत सरकार पर भ्रम फैलाने का आरोप



रांची : झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि भारत सरकार द्वारा इस वर्ष पारित एमएमडीआर एक्ट (खान और खनिज विकास और विनियमन संशोधन बिल, 2026) राज्य और राष्ट्रहित में है, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस इसकी गलत व्याख्या कर जनता के बीच भ्रम फैला रहे हैं। भाजपा के रांची स्थित प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में उन्होंने आरोप लगाया कि इन दलों का विरोध औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने और लीगल माइनिंग को पारदर्शी बनाने के खिलाफ है। उन्होंने राज्य सरकार पर जल, जंगल, जमीन के नारे की आड़ में भ्रष्टाचार, लूट, जंगलों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का आरोप भी लगाया।

श्री दास ने कहा कि एमएमडीआर एक्ट को लेकर झामुमो, कांग्रेस और अन्य दलों की ओर से भ्रम फैलाया जा रहा है और इस अधिनियम पर किसी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि सवाल केवल 11,000 करोड़ रुपये के उपकर का नहीं, बल्कि वित्तीय अनुशासन, अधिक उत्पादन, रोजगार और औद्योगिक विकास का है। उनके अनुसार, 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने रॉयल्टी के अलावा खनन प्रभावित जिलों के विकास के लिए डीएमएफटी में ग्रामसभा की सहमति से आवंटन राशि 30 प्रतिशत से बढ़ाकर 70 प्रतिशत कर दी। उन्होंने दावा किया कि झारखंड में 34 कोल ब्लॉक हैं, लेकिन केवल चार चालू हैं। राज्य सरकार 30 कोल ब्लॉक संचालित नहीं करा रही है। लौह अयस्क की 15 में से छह और बॉक्साइट की 37 में से 17 खदानें ही चालू हैं। उन्होंने कहा कि जमशेदपुर की सरकार को 11,000 करोड़ रुपये देने वाली टाटा कंपनी से राज्य को इतना राजस्व मिलता है, जितना पूरे झारखंड की स्थानीय निकायों से भी नहीं मिलता। वित्त वर्ष 2025-26 में ओडिशा का खनिज राजस्व 60,000 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जबकि झारखंड का लक्ष्य 18,844 करोड़ रुपये है। डीएमएफटी के कुल 18,250 करोड़ रुपये में से 7,915 करोड़ रुपये से अधिक खर्च नहीं हुए और 2,487 परियोजनाएं अधूरी हैं। उन्होंने बताया कि धनबाद में 2,393.58 करोड़, पश्चिमी सिंहभूम में 1,802.82 करोड़, बोकारो में 1,055.40 करोड़, पाकुड़ में 527.88 करोड़ और रामगढ़ में 518.82 करोड़ रुपये का डीएमएफटी फंड खर्च नहीं किया गया।
श्री दास ने आरोप लगाया कि डीएमएफटी की राशि का इस्तेमाल शुद्ध पेयजल, अस्पतालों में बेड, गर्भवती महिलाओं के परिवहन, शौचालय और बुनियादी सुविधाओं पर नहीं हो रहा तथा दो वर्षों से इसका ऑडिट भी नहीं कराया गया। उन्होंने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि वित्त वर्ष 2024-25 की पहली तिमाही अप्रैल-जुलाई में कोयले का उत्पादन 44.78 मिलियन टन था, जबकि 2025-26 की इसी अवधि में यह बढ़कर 37.25 मिलियन टन हो गया। उन्होंने झारखंड में कोयले की लागत अधिक होने और अवैध खनन के कारण हर वर्ष करोड़ों रुपये के नुकसान का आरोप लगाया। उनके अनुसार, झारखंड में 2025-26 के दौरान 12 कोयला खदानों से 2045-3212 रुपये प्रति टन ओडिशा और छत्तीसगढ़ में 1514-2681 रुपये प्रति टन की दर उपलब्ध है। लौह अयस्क की दर झारखंड में 8284 रुपये प्रति टन, ओडिशा में 7493 रुपये और छत्तीसगढ़ में 7422 रुपये प्रति टन है। उन्होंने कहा कि वैध माइनिंग बढ़ने से चाईबासा, नोवामुंडी, गुवा और किरीबुरू समेत डाउनस्ट्रीम उद्योगों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी। उन्होंने दावा किया कि बीते छह वर्षों में राज्य की 26 खदानों के पट्टे समाप्त हो गए और समय पर पारदर्शी नीलामी नहीं होने से राजस्व, रॉयल्टी, प्रीमियम और रोजगार का नुकसान हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि टाटा कंपनी की एक खदान की लीज समाप्त होने के बाद तीन महीने से मंजूरी का इंतजार है। प्रेस वार्ता में प्रदेश मीडिया प्रभारी योगेंद्र प्रताप सिंह और प्रदेश प्रवक्ता अजय गुप्ता भी मौजूद रहे।


