तीन दशक पुराने भाजपा किले में प्रशांत किशोर की बड़ी जीत, पांच वजहों ने बदल दिया बांकीपुर का चुनावी इतिहास

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पटना : बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भाजपा के तीन दशक से अधिक पुराने मजबूत गढ़ में जीत दर्ज कर बिहार की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर दिया। यह सीट 1995 से लगातार भाजपा के कब्जे में थी। मतगणना के दौरान प्रशांत किशोर ने शुरू से बढ़त बनाए रखी और 26 राउंड की गिनती पूरी होने के बाद वे भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा से 15,864 मतों से आगे थे। काउंटिंग सेंटर पहुंचे प्रशांत किशोर ने इसे बांकीपुर की जनता की जीत बताया और कहा कि जिन लोगों ने उन्हें वोट नहीं दिया, उनका विश्वास जीतने के लिए भी वे काम करेंगे।

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आज की बांकीपुर विधानसभा सीट पहले पटना पश्चिम के नाम से जानी जाती थी। 2008 के परिसीमन के बाद इसका नाम बदलकर बांकीपुर किया गया। इस सीट पर पहला चुनाव 1957 में हुआ था, जिसमें कांग्रेस के रामशरण साव विधायक बने थे। इसके बाद कृष्ण बल्लभ सहाय, महामाया प्रसाद सिन्हा, ए.के. सेन, सुनील मुखर्जी, ठाकुर प्रसाद और रणजीत सिन्हा जैसे नेता यहां से निर्वाचित हुए। वर्ष 1985 में निर्दलीय उम्मीदवार रामानंद यादव ने जीत दर्ज कर बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया था। इसके बाद 1995 में भाजपा के नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा की जीत के साथ सीट पर भाजपा का दबदबा शुरू हुआ।

नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने 1995, 2000, फरवरी 2005 और अक्टूबर 2005 के चुनाव लगातार जीते। वर्ष 2006 में उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके पुत्र नितिन नवीन पहली बार विधायक बने। इसके बाद उन्होंने 2010, 2015, 2020 और 2025 के विधानसभा चुनाव में भी जीत का सिलसिला जारी रखा। वर्ष 2010 में उनकी जीत का अंतर 60,840 मत, 2015 में 39,767 और 2020 में 39,036 मत रहा। वर्ष 2025 में उन्हें 63 प्रतिशत मत मिले और उन्होंने राजद उम्मीदवार को 51 हजार से अधिक मतों से हराया था। ऐसे में प्रशांत किशोर की जीत को भाजपा के सबसे सुरक्षित राजनीतिक किलों में बड़ी सेंध माना जा रहा है।

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इस चुनाव में भाजपा के लिए उम्मीदवार बदलने का फैसला नुकसानदायक साबित हुआ। पार्टी ने पहले अभिषेक बंटी को उम्मीदवार बनाया था। उन्होंने नामांकन दाखिल करने के साथ चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया था, लेकिन बाद में उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का निर्णय लिया। इसके बाद भाजपा ने नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा। चुनाव के बीच उम्मीदवार बदलने से कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति बनी, जबकि विपक्ष को भाजपा पर हमला करने का नया मुद्दा मिल गया।

प्रशांत किशोर के चुनाव मैदान में उतरते ही बांकीपुर का मुकाबला पूरे बिहार की सबसे चर्चित राजनीतिक लड़ाइयों में शामिल हो गया। उन्होंने बड़ी सभाओं के बजाय घर-घर संपर्क पर अधिक जोर दिया और स्थानीय समस्याओं, शिक्षा, रोजगार तथा विकास को चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाया। उनके प्रचार अभियान ने मुकाबले को भाजपा, राजद और जन सुराज की त्रिकोणीय लड़ाई से बदलकर भाजपा बनाम जन सुराज कर दिया।

जन सुराज ने बूथ स्तर पर भी मजबूत तैयारी की। पार्टी कार्यकर्ताओं ने मतदाताओं से लगातार संपर्क बनाए रखा और अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने पर विशेष ध्यान दिया। दूसरी ओर कम मतदान प्रतिशत भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हुआ। बिहार सरकार के मंत्री प्रमोद चंद्रवंशी ने भी परिणाम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बांकीपुर आज भी भाजपा का गढ़ है, लेकिन पार्टी के समर्थक मतदान के लिए घरों से बाहर नहीं निकले। उन्होंने स्वीकार किया कि इस स्थिति पर भाजपा को गंभीरता से विचार करना होगा।

युवा और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं का झुकाव भी प्रशांत किशोर की ओर होने की चर्चा रही। चुनाव प्रचार के दौरान जन सुराज की सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर सक्रियता अधिक दिखाई दी। रोजगार, शिक्षा और राजनीतिक बदलाव की बात ने युवाओं के एक वर्ग को प्रभावित किया। वहीं राजद अपने पारंपरिक वोट बैंक को पूरी तरह एकजुट नहीं रख सकी। पिछले विधानसभा चुनाव में दूसरे स्थान पर रहने वाली राजद इस बार तीसरे स्थान पर पहुंच गई। कमजोर प्रचार और पारंपरिक वोटों में बिखराव का सीधा लाभ जन सुराज को मिला।

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भाजपा ने बांकीपुर सीट बचाने के लिए पूरी ताकत लगाई थी। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, सांसदों, विधायकों और संगठन के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों ने प्रचार किया। इसके बावजूद प्रशांत किशोर ने लगातार बढ़त बनाए रखी और भाजपा के लंबे राजनीतिक वर्चस्व को समाप्त कर दिया। यह नतीजा केवल एक विधानसभा सीट की जीत नहीं, बल्कि बिहार में नए राजनीतिक विकल्प की संभावनाओं का संकेत माना जा रहा है। भाजपा के लिए यह परिणाम आत्ममंथन का अवसर है, जबकि राजद को भी अपने संगठन, प्रचार और पारंपरिक वोट बैंक को लेकर नई रणनीति तैयार करनी होगी।

 

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