मतुआ समुदाय में भय और गुस्सा, वोटर सूची से नाम हटने के बाद BJP-TMC में तीखी सियासत

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कोलकाता : पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद मतुआ समुदाय में चिंता और गुस्सा फैल गया है। यह मुद्दा राज्य की राजनीति में एक बड़ा सियासी बिंदु बन गया है। मतुआ बहुल इलाके जैसे नदियां और नॉर्थ 24 परगना में कई लोगों के नाम मतदाता सूची से गायब हो जाने की बात सामने आई है। इससे समुदाय के बीच डर और असमंजस की स्थिति बनी है कि कहीं उनका वोट अधिकार या पहचान खतरे में न पड़ जाए। मतुआ समुदाय हिंदू शरणार्थियों का बड़ा समूह है, जो 1950 के दशक में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारत आए थे। मतदान सूची से हटाए गए नामों को लेकर लोग चिंतित हैं कि बिना 2002 की सूची से जुड़े दस्तावेज़ के वे सूची में दोबारा शामिल नहीं हो पाएंगे।

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राजनीतिक दल BJP और TMC इस मुद्दे पर आमने-सामने हैं। BJP का कहना है कि नाम हटना केवल मतदाता सूची की “सफाई” है और समुदाय को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत नागरिकता मिल जाएगी।वहीं TMC का कहना है कि SIR के तहत दस्तावेज़ की वजह से मतुआ समुदाय के लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं और इससे उन्हें वोटर सूची से बाहर किया जा रहा है। पार्टी इसे राजनीतिक निशाना भी बता रही है।

यह मामला पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2026 से पहले सियासी बहस और मतदाता पहचान के मुद्दों को और तेज कर रहा है। समुदाय की स्थिति को लेकर दोनों पक्षों ने अपने बयान जारी किए हैं और इस मुद्दे पर राजनीति गहराती जा रही है।

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