जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय में गैर-शैक्षणिक पदों के पुनर्गठन की मांग, महासंघ बोला— ‘कॉलेज नहीं, विश्वविद्यालय की तरह चले व्यवस्था’






जमशेदपुर : झारखण्ड विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय कर्मचारी महासंघ ने जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय की गैर-शैक्षणिक प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए माननीय कुलपति महोदया को ई-मेल के माध्यम से 09.07.2026 को एक विस्तृत मांग-पत्र प्रेषित किया है। महासंघ का कहना है कि विश्वविद्यालय बनने के 4 वर्षों बाद भी संस्थान का संचालन पूर्ववर्ती Jamshedpur Women’s College की स्वीकृत पद संरचना एवं कार्यप्रणाली के आधार पर किया जा रहा है, जबकि झारखण्ड सरकार ने गैर-शैक्षणिक पदों के पुनर्गठन के लिए स्पष्ट वैधानिक व्यवस्था लागू कर दी है।


महासंघ ने अपने ज्ञापन में उल्लेख किया है कि झारखण्ड सरकार, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के ज्ञापांक संख्या -05/प0-10/2023/899, दिनांक 29 अप्रैल 2026 के संकल्प के माध्यम से राज्य विश्वविद्यालयों में गैर-शैक्षणिक पदों के पुनर्गठन (Restructuring) का स्पष्ट प्रावधान किया गया है। वहीं झारखण्ड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 2026 राज्य विश्वविद्यालयों के संचालन, प्रशासनिक कार्यप्रणाली एवं संस्थागत उत्तरदायित्व के लिए वैधानिक ढांचा निर्धारित करता है। इसके बावजूद यदि विश्वविद्यालय आज भी महाविद्यालयीय पद संरचना के आधार पर संचालित होता है, तो यह विश्वविद्यालयीय प्रशासनिक व्यवस्था की मूल भावना के विपरीत है।
महासंघ का कहना है कि विश्वविद्यालय बनने के बाद प्रशासनिक, वित्तीय, परीक्षा, स्थापना, पुस्तकालय एवं प्रयोगशाला संबंधी दायित्वों में व्यापक वृद्धि हुई है। ऐसी स्थिति में पुराने महाविद्यालयीय पदों के आधार पर कार्य कराना न केवल प्रशासनिक दृष्टि से अनुपयुक्त है, बल्कि पदाधारित उत्तरदायित्व (Post-Based Accountability), वैधानिक जवाबदेही एवं संस्थागत पारदर्शिता को भी प्रभावित करता है। संगठन का मत है कि किसी भी विश्वविद्यालय में प्रत्येक प्रशासनिक एवं वित्तीय कार्य संबंधित स्वीकृत पद के माध्यम से ही संपादित होना चाहिए, ताकि उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जा सके।
महासंघ ने अपने ज्ञापन में यह भी कहा है कि वर्तमान व्यवस्था व्यवहारिक रूप से यह संकेत देती है कि संस्थान अब भी महाविद्यालयीय प्रशासनिक ढांचे में संचालित हो रहा है, जबकि उसे विश्वविद्यालय अधिनियम एवं राज्य सरकार के पुनर्गठन संकल्प के अनुरूप पूर्णतः विश्वविद्यालयीय ढांचे में कार्य करना चाहिए। संगठन के अनुसार, पुनर्गठित पद संरचना को लागू किए बिना विश्वविद्यालय की प्रशासनिक प्रणाली को पूर्ण रूप से वैधानिक, उत्तरदायी एवं जवाबदेह नहीं बनाया जा सकता।
महासंघ ने कुलपति के समक्ष चार प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें राज्य सरकार के संकल्प के अनुरूप गैर-शैक्षणिक पदों का तत्काल पुनर्गठन, वर्तमान कर्मचारियों के सेवा हितों एवं वरीयता की सुरक्षा, नियमित नियुक्ति होने तक योग्य एवं वरिष्ठ कर्मचारियों को पुनर्गठित पदों पर अंतरिम प्रभारी दायित्व प्रदान करना तथा वर्तमान कर्मचारियों को उनकी योग्यता, अनुभव एवं वरीयता के आधार पर पुनर्गठित पदों में प्राथमिकता के साथ समायोजित करना शामिल है। संगठन का स्पष्ट मत है कि यह किसी पदोन्नति की मांग नहीं, बल्कि नियमित नियुक्ति होने तक विश्वविद्यालय की प्रशासनिक निरंतरता एवं वैधानिक कार्यप्रणाली बनाए रखने की अंतरिम व्यवस्था है।
महासंघ ने यह भी कहा है कि राज्य सरकार द्वारा पुनर्गठित पदों का उद्देश्य विश्वविद्यालय प्रशासन में पदाधारित उत्तरदायित्व, कार्य की पारदर्शिता, प्रशासनिक दक्षता एवं वित्तीय जवाबदेही को सुदृढ़ करना है। यदि पुनर्गठित पदों को व्यवहार में लागू नहीं किया जाता, तो विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पुराने महाविद्यालयीय ढांचे तक ही सीमित रह जाएगी, जिससे वैधानिक व्यवस्था की प्रभावशीलता प्रभावित होगी।
महासंघ ने कुलपति से आग्रह किया है कि राज्य सरकार के संकल्प एवं विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुरूप शीघ्र आवश्यक कार्रवाई करते हुए विश्वविद्यालय की गैर-शैक्षणिक प्रशासनिक संरचना का पुनर्गठन सुनिश्चित किया जाए। महासंघ का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय का संचालन पुनर्गठित पद संरचना एवं पदाधारित उत्तरदायित्व के अनुरूप नहीं किया जाता है, तो प्रशासनिक एवं वित्तीय कार्यों की वैधानिक जवाबदेही प्रभावित होगी तथा वित्तीय नियमों एवं शासकीय प्रक्रियाओं के अनुपालन में जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। अतः विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था को विधिसम्मत एवं उत्तरदायी बनाने के लिए पुनर्गठित पद संरचना को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाना आवश्यक है।


