बंगाल में दल बदले, झंडे बदले… लेकिन बंगाल की सत्ता का सामाजिक चेहरा नहीं बदला… भाजपा भी नहीं तोड़ पाई बंगाल का पुराना सत्ता समीकरण! 9 में से 8 CM ब्राह्मण ya कायस्थ…

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बंगाल :- पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला। लंबे समय तक सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए भाजपा ने राज्य की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर दिया। भाजपा समर्थक इसे “परिवर्तन का जनादेश” बता रहे हैं। लेकिन इस राजनीतिक परिवर्तन के बीच एक ऐसी बहस भी तेज हो गई है, जिसने बंगाल की राजनीति के सामाजिक ढांचे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चर्चा इस बात की हो रही है कि सत्ता बदल गई, पार्टी बदल गई, विचारधारा बदल गई, लेकिन मुख्यमंत्री पद पर सामाजिक प्रतिनिधित्व की तस्वीर अब भी लगभग वैसी ही बनी हुई है।

भाजपा की जीत के बाद अब शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की चर्चा तेज है। राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि भाजपा नेतृत्व ने उन्हें बंगाल का नया चेहरा बनाने का फैसला कर लिया है। लेकिन इसी के साथ सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा भी बंगाल की उस पारंपरिक सत्ता संरचना को नहीं बदल पाई, जिसमें दशकों से सामान्य वर्ग और खास तौर पर तथाकथित “भद्रलोक” समाज का प्रभाव रहा है?

पश्चिम बंगाल के इतिहास पर नजर डालें तो अब तक बने 9 मुख्यमंत्रियों में से 8 मुख्यमंत्री ब्राह्मण या कायस्थ समाज से रहे हैं। चाहे कांग्रेस का दौर रहा हो, वामपंथ का लंबा शासन या फिर ममता बनर्जी का नेतृत्व — सत्ता के शीर्ष पर सामाजिक विविधता बहुत कम दिखाई दी। अब भाजपा, जो खुद को सामाजिक न्याय और व्यापक प्रतिनिधित्व की राजनीति करने वाली पार्टी बताती है, उसके शासन में भी मुख्यमंत्री पद के लिए शुभेंदु अधिकारी का नाम सबसे आगे है, जो सामान्य वर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं।

यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन जरूर हुआ है, लेकिन सामाजिक सत्ता का ढांचा अब भी वैसा ही बना हुआ है। भाजपा ने चुनाव के दौरान मतुआ समाज, आदिवासी वोटरों, पिछड़े वर्गों और दलित समुदाय को लेकर बड़े पैमाने पर राजनीति की। पार्टी ने खुद को उन वर्गों की आवाज बताया, जो लंबे समय तक सत्ता से दूर रहे। लेकिन मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में फिर एक सामान्य वर्गीय नेता का आगे आना नई बहस को जन्म दे रहा है।

शुभेंदु अधिकारी बंगाल की राजनीति का बड़ा और प्रभावशाली चेहरा हैं। नंदीग्राम आंदोलन से लेकर ममता बनर्जी को चुनौती देने तक उन्होंने खुद को एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया।  भाजपा के भीतर भी उन्हें संगठन और जनाधार दोनों के लिहाज से मजबूत नेता माना जाता है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री पद की दौड़ में उनका नाम सबसे ऊपर बताया जा रहा है।

लेकिन सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल अब भाजपा के सामने भी खड़ा हो गया है। आलोचकों का कहना है कि अगर भाजपा वास्तव में बंगाल की राजनीति में “नया सामाजिक समीकरण” लाना चाहती, तो मुख्यमंत्री पद के लिए किसी दलित, आदिवासी या ओबीसी चेहरे को आगे बढ़ा सकती थी। खासकर तब, जब पार्टी ने चुनाव में इन वर्गों के बीच व्यापक समर्थन हासिल करने का दावा किया।

बंगाल में लंबे समय तक “भद्रलोक राजनीति” का प्रभाव रहा है। भद्रलोक शब्द बंगाल के उस शिक्षित और प्रभावशाली उच्च वर्ग के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें मुख्य रूप से ब्राह्मण, कायस्थ और वैद्य समुदाय शामिल रहे हैं। प्रशासन, शिक्षा, मीडिया और राजनीति में दशकों तक इन्हीं वर्गों का वर्चस्व बना रहा। यही प्रभाव मुख्यमंत्री पद पर भी लगातार दिखाई देता रहा है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बंगाल में जाति की राजनीति खुलकर नहीं होती, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जाति का असर नहीं है। यहां जाति अक्सर “अदृश्य राजनीति” के रूप में काम करती है। चुनावी मंचों पर भले जाति की चर्चा कम हो, लेकिन सत्ता और संस्थाओं में प्रतिनिधित्व को देखें तो सामाजिक असमानता साफ दिखाई देती है।

भाजपा की जीत के बाद अब यह सवाल और बड़ा हो गया है कि क्या बंगाल की राजनीति वास्तव में सामाजिक बदलाव की ओर बढ़ रही है या फिर सिर्फ राजनीतिक दल बदल रहे हैं, जबकि सत्ता का सामाजिक ढांचा वही बना हुआ है? शुभेंदु अधिकारी अगर मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हैं, तो यह एक बार फिर उसी परंपरा की निरंतरता मानी जाएगी, जहां बंगाल की सर्वोच्च राजनीतिक कुर्सी पर सामान्य वर्ग का दबदबा कायम रहा है।

हालांकि भाजपा समर्थकों का तर्क अलग है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री चुनने का आधार जाति नहीं, बल्कि नेतृत्व क्षमता और जनाधार होना चाहिए। उनके मुताबिक शुभेंदु अधिकारी ने जमीनी स्तर पर संघर्ष किया है और भाजपा को बंगाल में खड़ा करने में बड़ी भूमिका निभाई है, इसलिए उन्हें मुख्यमंत्री बनाना स्वाभाविक राजनीतिक फैसला है।

लेकिन विपक्ष और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले लोग इसे अलग नजरिए से देख रहे हैं। उनका कहना है कि अगर दशकों बाद सत्ता परिवर्तन हुआ था, तो लोगों को उम्मीद थी कि सामाजिक प्रतिनिधित्व में भी बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। मगर अब तस्वीर देखकर कई लोग कह रहे हैं — “चेहरे बदले, झंडे बदले, लेकिन सत्ता का सामाजिक चेहरा अब भी वही है।”

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय सिर्फ सरकार बदलने की कहानी नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक प्रतिनिधित्व और सत्ता संरचना पर भी बड़ी बहस बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गहराने की संभावना है, क्योंकि बंगाल की राजनीति अब सिर्फ विचारधारा नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन के सवालों से भी घिरती दिखाई दे रही है।

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