संसद में गूंजा हीमोफीलिया इलाज का मुद्दा, जीवनरक्षक दवा उपलब्ध कराने की मांग

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जमशेदपुर : सांसद विद्युत बरण महतो ने 17 मार्च 2026 को संसद में नियम 377 के तहत हीमोफीलिया बीमारी और उसके इलाज से जुड़ा अहम मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि यह एक गंभीर रक्तस्राव संबंधी बीमारी है, जिसमें शरीर में खून का थक्का बनने की क्षमता बेहद कम हो जाती है। खासकर बच्चों को सामान्य जीवन जीने के लिए जीवनभर ‘फैक्टर-आठ’ आधारित इलाज की जरूरत पड़ती है। पहले इस बीमारी का इलाज ताजा रक्त या प्लाज्मा से किया जाता था, जो ज्यादा प्रभावी नहीं था, जबकि बाद में उपयोग किए गए रक्त-आधारित फैक्टर-आठ से कई मरीजों में HIV, एड्स और हेपाटाइटिस बी जैसे संक्रमण के मामले सामने आए।

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सांसद ने आगे बताया कि इसके बाद रिकॉम्बिनेंट और विस्तारित अर्ध-आयु वाले फैक्टर-आठ उपचार आए, जिन्हें सप्ताह में कई बार नस के जरिए देना पड़ता है, जिससे मरीजों को काफी परेशानी होती है। हाल के वर्षों में ‘एमिसिज़ुमैब’ नाम की नई दवा सामने आई है, जिसे महीने में एक बार त्वचा के नीचे दिया जाता है और इससे रक्तस्राव लगभग पूरी तरह नियंत्रित हो जाता है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने भी इसे प्रभावी उपचार माना है।

उन्होंने यह भी कहा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2025-26 में इस दवा को आयात शुल्क और जीएसटी से मुक्त कर दिया है, लेकिन इसके बावजूद राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के स्तर पर, खासकर झारखंड में, मरीजों को यह दवा उपलब्ध नहीं हो पा रही है। सांसद ने सरकार से अपील की कि हीमोफीलिया-ए के सभी मरीजों तक इस जीवनरक्षक दवा की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम जल्द उठाए जाएं।

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