“ मौत का जाल बना पुल!” — 7 साल से एप्रोच पथ गायब, महुआडांड़ में बच्चों की जान से खिलवाड़, प्रशासन बना तमाशबीन


महुआडांड़ (लातेहार) : यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे-सीधे लोगों की जान से खिलवाड़ है। महुआडांड़ प्रखंड के परहाटोली पंचायत स्थित रामपुर नदी पर बना पुल पिछले 7 साल से अधूरा पड़ा है, क्योंकि उसका एप्रोच पथ हर साल बह जाता है और प्रशासन हर बार आंख मूंद लेता है। नतीजा—हजारों ग्रामीण और मासूम बच्चे रोज मौत के मुंह में कदम रखकर नदी पार करने को मजबूर हैं।करोड़ों रुपये खर्च कर बनाया गया यह पुल पहली ही बरसात में फेल हो गया। एप्रोच पथ ध्वस्त हो गया और तब से लेकर आज तक इसे स्थायी रूप से ठीक करने की जहमत किसी अधिकारी ने नहीं उठाई। हर साल बरसात आती है, रास्ता बह जाता है, और फाइलों में “काम जारी है” का खेल चलता रहता है। आखिर कब तक कागजों पर विकास दिखाकर जमीनी सच्चाई से मुंह मोड़ा जाएगा सबसे दर्दनाक तस्वीर स्कूली बच्चों की है। छोटे-छोटे बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर इस पुल को पार करते हैं। पुल के बाद सड़क तक पहुंचने के लिए उन्हें खतरनाक ढलान से नीचे उतरना पड़ता है, जहां जरा सी चूक उन्हें नदी में गिरा सकती है। बरसात के समय यह रास्ता सीधे मौत का रास्ता बन जाता है। क्या प्रशासन किसी बच्चे की जान जाने का इंतजार कर रहा हैग्रामीणों ने अपनी मजबूरी में तीन बार श्रमदान कर एप्रोच पथ बनाया, लेकिन हर बार नदी की तेज धारा उसे बहा ले गई। यह साफ संकेत है कि पुल का डिजाइन ही अधूरा और घटिया है। जब तक पुल की लंबाई नहीं बढ़ेगी और अतिरिक्त पिलर नहीं लगाया जाएगा, तब तक यह समस्या खत्म नहीं होगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या इंजीनियरों और अधिकारियों को यह बुनियादी बात समझ में नहीं आती, या जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा हैस्थिति इतनी बदतर है कि बीमार, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग समय पर अस्पताल तक नहीं पहुंच पाते। कई बार मरीजों को खाट या कंधे पर उठाकर नदी पार करानी पड़ती है। यह 21वीं सदी का भारत है या किसी उपेक्षित इलाके की त्रासदी ग्रामीणों का गुस्सा अब फूटने लगा है। उनका कहना है कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से दर्जनों बार शिकायत की गई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला, काम नहीं। यह साफ दिखाता है कि सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका है और जिम्मेदार लोग सिर्फ कुर्सी बचाने में लगे हैं।



