लाल किला में गूंजेगी जनजातीय हुंकार, दिल्ली में दिखेगी आदिवासी अस्मिता की विराट ताकत……महुआडांड़ से दिल्ली रवाना हुआ जनजातीय चेतना का महासैलाब, मांदर-नगाड़ों और पारंपरिक वेशभूषा से गूंजा पूरा इलाका


महुआडांड़: महुआडांड़ झारखंड की धरती शुक्रवार को जनजातीय अस्मिता, संस्कृति और अधिकारों की ऐतिहासिक हुंकार से गूंज उठी। जनजातीय सुरक्षा मंच के तत्वावधान में महुआडांड़ सहित झारखंड के विभिन्न जिलों से हजारों आदिवासी समाज के लोग नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में आयोजित होने वाले “जनजातीय सांस्कृतिक समागम एवं महा गर्जना रैली” में शामिल होने के लिए रवाना हुए।पारंपरिक वेशभूषा, तीर-धनुष, मांदर, ढोल, नगाड़ा और ढाक की थाप के साथ निकले इस विशाल जनसैलाब ने पूरे क्षेत्र को जनजातीय रंग में रंग दिया। जगह-जगह ग्रामीणों ने दल का स्वागत किया, जबकि युवाओं और महिलाओं में खासा उत्साह देखने को मिला।जो ना भोलेनाथ का, वो ना हमारे जात का” जैसे गगनभेदी नारों से पूरा महुआडांड़ गूंज उठा। लोगों ने कहा कि यह केवल एक रैली नहीं, बल्कि जनजातीय समाज के अस्तित्व, संस्कृति, पहचान और अधिकारों की निर्णायक लड़ाई है।इस ऐतिहासिक यात्रा में वनवासी कल्याण केंद्र के जिला अध्यक्ष अजय उरांव, जनजातीय सुरक्षा मंच के जिला संयोजक बलेश्वर बड़ाईक, संयोजक ललकु खेरवार, मुखिया प्रदीप बड़ाईक समेत बड़ी संख्या में समाज के प्रतिनिधि शामिल हुए।
*दिल्ली में जुटेगा देशभर का आदिवासी समाज*
नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में आयोजित यह महासमागम देशभर के जनजातीय समाज की सांस्कृतिक एकता और शक्ति का विराट प्रदर्शन माना जा रहा है। आयोजकों के अनुसार झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों से लाखों आदिवासी प्रतिनिधि कार्यक्रम में भाग लेंगे।कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता जनजातीय सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम करेंगे।समागम का उद्देश्य जनजातीय समाज की समृद्ध संस्कृति, परंपरा, लोककला, सामाजिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से प्रस्तुत करना बताया जा रहा है। आदिवासी समाज के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा और वाद्ययंत्रों के साथ सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करेंगे।
*रेल मंत्रालय के द्वारा चलाया जा रहा विशेष ट्रेनें, झारखंड से जाएंगे 4500 प्रतिनिधि*
जनजातीय सुरक्षा मंच के पदाधिकारियों ने बताया कि समागम की सफलता के लिए 19 मई से ही झारखंड के विभिन्न देवी मंडपों और सरना स्थलों पर पूजा-अर्चना की जा रही है।उन्होंने जानकारी दी कि दिल्ली रवाना होने वाले प्रतिनिधियों के लिए विशेष ट्रेनों का संचालन किया जा रहा है। झारखंड से करीब 4500 आदिवासी प्रतिनिधि रांची से दिल्ली के लिए रवाना हुए हैं।प्रतिनिधि अपने साथ मांदर, ढोल, नगाड़ा और पारंपरिक जनजातीय वाद्ययंत्र लेकर दिल्ली पहुंचेंगे, जहां झारखंड की सांस्कृतिक पहचान राष्ट्रीय मंच पर दिखाई देगी।
*डी-लिस्टिंग की मांग बनेगी आंदोलन का मुख्य मुद्दा*
इस महा गर्जना रैली का सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा धर्मांतरण कर चुके लोगों को अनुसूचित जनजाति (ST) सूची से बाहर करने यानी डी-लिस्टिंग की मांग को माना जा रहा है।जनजातीय सुरक्षा मंच का कहना है कि मूल आदिवासी समाज के अधिकार, आरक्षण और पहचान को सुरक्षित रखने के लिए यह कदम जरूरी है। संगठन से जुड़े लोगों ने कहा कि आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपराओं को बचाने के लिए अब देशव्यापी जनजागरण की आवश्यकता है।उनका दावा है कि दिल्ली के लाल किला मैदान से उठने वाली यह आवाज आने वाले समय में जनजातीय समाज के अधिकारों की सबसे बड़ी राष्ट्रीय हुंकार बनेगी।
*दूसरी ओर उठी विरोध की आवाज, कई संगठनों ने किया बहिष्कार का ऐलान*
जहां एक ओर दिल्ली जाने की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं, वहीं दूसरी ओर झारखंड के कई आदिवासी, मूलवासी, सामाजिक और पारंपरिक संगठनों ने इस कार्यक्रम के बहिष्कार की अपील भी जारी की है।पूर्व शिक्षा मंत्री गीता श्री उरांव सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों ने आरोप लगाया कि “डी-लिस्टिंग” के नाम पर आदिवासी समाज की पारंपरिक एकता को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।बहिष्कार करने वाले प्रतिनिधियों का कहना है कि आदिवासी समाज प्रकृति पूजक है और उसकी अलग सांस्कृतिक पहचान है, जिसे किसी विशेष धार्मिक ढांचे में बांधने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।इस बहिष्कार में कई सामाजिक संगठनों, पारंपरिक ग्राम सभाओं, आदिवासी अधिकार मंचों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी भागीदारी दर्ज कराई है।
*महुआडांड़ बना जनजातीय चेतना का केंद्र*
महुआडांड़ से बड़ी संख्या में युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों का दिल्ली के लिए रवाना होना क्षेत्र में जनजातीय एकजुटता और सामाजिक चेतना का बड़ा संदेश माना जा रहा है।रवाना होने से पहले समाज के लोगों ने कहा कि अब जनजातीय समाज अपने अधिकारों और अस्तित्व के सवाल पर पीछे हटने वाला नहीं है।लोगों का कहना है कि लाल किला मैदान से उठने वाली यह गर्जना आने वाले समय में देश की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती हैमहुआडांड़ से निकला यह कारवां अब जनजातीय अस्मिता की राष्ट्रीय आवाज बनता नजर आ रहा है।



