दितसाही में आज मनेगा पारंपरिक इंद्रोत्सव, गाड़ा जाएगा 25 से 30 फीट ऊंचा इंद्र छाता


खरसावां : अच्छी फसल, पर्याप्त वर्षा और क्षेत्र में सुख-समृद्धि की कामना के साथ बुधवार को दितसाही में पारंपरिक इंद्रोत्सव मनाया जाएगा। देवराज इंद्र की आराधना से जुड़े इस पर्व की तैयारियां पूरी कर ली गयी हैं। यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। पूरे कोल्हान क्षेत्र में दितसाही को ऐसा स्थल बताया गया है, जहां इस स्वरूप में इंद्रोत्सव मनाने की ऐतिहासिक परंपरा है। दितसाही स्थित इंद मैदान में पारंपरिक विधि-विधान से पूजा के बाद करीब 25 से 30 फीट ऊंचा ‘इंद्र छाता’ गाड़ा जाएगा। स्थानीय मान्यता है कि इस आराधना से अकाल दूर रहता है, पर्याप्त बारिश होती है और धन-धान्य में वृद्धि होती है।


इंद्रोत्सव का इतिहास खरसावां राजघराने से जुड़ा है। आजादी से पहले पूजा का पूरा खर्च रियासत के राजा वहन करते थे। वर्ष 1947 में खरसावां रियासत के भारत गणराज्य में विलय के समय तत्कालीन राजा श्रीराम चंद्र सिंहदेव ने बिहार सरकार के साथ मर्जर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किये थे। इसके तहत खरसावां के 13 प्रमुख धार्मिक आयोजनों की जिम्मेदारी सरकार ने ली थी, जिसमें दितसाही का इंद्रोत्सव भी शामिल था। वर्तमान में खरसावां अंचल कार्यालय के माध्यम से पूजा के लिए सरकारी राशि उपलब्ध करायी जाती है।
इंद्रोत्सव के दिन किसान अपने खेतों में ‘इंद डांग’ यानी करम की डाली भी गाड़ते हैं। लोक मान्यता है कि ऐसा करने से फसलें हानिकारक कीटों और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रहती हैं। बदलते समय के बावजूद ग्रामीण इस पर्व को खरसावां की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर पारंपरिक रीति-रिवाज और आपसी सद्भाव के साथ मनाते आ रहे हैं।


