“जड़ों से जुड़े रहिए और उड़ान भरिए” : नेशा उरांव ने आदिवासी परंपराओं और समकालीन आकांक्षाओं के बीच संतुलन का आह्वान किया

रांची : उषा मार्टिन विश्वविद्यालय में विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर “मीडिया, संस्कृति और समाज: समकालीन भारत में आदिवासी आख्यान की पुनर्कल्पना” विषय पर एक अकादमिक पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन फैकल्टी ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (FJMC) द्वारा किया गया। चर्चा में वक्ताओं, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने भाग लिया तथा आदिवासी पहचान, संस्कृति, साहित्य, शिक्षा, स्थायित्व और मीडिया में आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधित्व से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया।
पैनल में सुश्री नेशा उरांव, IRS, आयकर आयुक्त, प्रो. सत्य नारायण मुंडा, पूर्व कुलपति, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, रांची तथा डॉ. संतोष किरो, पूर्व पत्रकार एवं आदिवासी लेखक शामिल थे। चर्चा का संचालन सुमन श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक ने किया।
चर्चा के दौरान नेशा उरांव ने कहा कि समकालीन जीवन अपनाने का अर्थ आदिवासी समुदायों द्वारा अपनी परंपराओं को छोड़ देना नहीं है। उन्होंने युवाओं से अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए शिक्षा और विभिन्न पेशेवर क्षेत्रों में आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि युवा अपने समुदाय के लिए मशालवाहक बन सकते हैं और उन लोगों के लिए नए अवसरों और स्थानों का निर्माण कर सकते हैं, जो अभी तक इन पेशेवर क्षेत्रों में प्रवेश नहीं कर पाए हैं। उनका संदेश, “जड़ों से जुड़े रहिए और उड़ान भरिए”, चर्चा की मूल भावना को व्यक्त करता है।
नेशा उरांव ने आदिवासी समुदायों और प्रकृति के बीच गहरे संबंध पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने आदिवासी समुदायों को “भारत की जड़ें” बताते हुए प्रकृति पूजा की परंपरा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग पर जोर दिया ताकि समुदायों का अस्तित्व और उनकी सांस्कृतिक एवं पारिस्थितिक विरासत सुरक्षित रह सके। उन्होंने सामूहिक जीवन के महत्व को भी रेखांकित किया और कहा कि युवाओं के बढ़ते प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में प्रवेश करने के बावजूद सहयोग और सामूहिकता की भावना बनी रहनी चाहिए।
प्रो. सत्य नारायण मुंडा ने कहा कि आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए उनके अस्तित्व और स्थायित्व को सुनिश्चित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विकास की प्रक्रिया में आदिवासी समुदायों की आवश्यकताओं, उनके अस्तित्व तथा प्राकृतिक संसाधनों के साथ उनके पारंपरिक संबंधों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
डॉ. संतोष किरो ने विश्वविद्यालय स्तर पर आदिवासी विषयों पर इस प्रकार की अकादमिक चर्चा के आयोजन के लिए विश्वविद्यालय की सराहना की। उन्होंने कहा कि आदिवासी मुद्दों पर विश्वविद्यालयों में इस तरह की केंद्रित चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई है और इस पहल को एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने आदिवासी समुदायों की समृद्ध कहानी कहने की परंपरा का उल्लेख करते हुए असुर जैसे समुदायों की कहानियों को साहित्य और शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
डॉ. किरो ने कहा कि आदिवासी साहित्य को विद्यालयों और महाविद्यालयों में स्थान दिया जाना चाहिए, ताकि विद्यार्थी आदिवासी इतिहास, अनुभवों और ज्ञान परंपराओं को समझ सकें। चर्चा में भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge Systems) के माध्यम से आदिवासी ज्ञान और परंपराओं को औपचारिक शिक्षा से जोड़ने की संभावनाओं पर भी विचार किया गया।
पैनल में आदिवासी पहचान और राष्ट्रीय एकता के संबंध पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि अलग-अलग आदिवासी पहचान और सांस्कृतिक विशिष्टताएं राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध नहीं हैं। आदिवासी समुदाय भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना का अभिन्न हिस्सा हैं।
कार्यक्रम में प्रो. राजनी कांत, कुलपति, उषा मार्टिन विश्वविद्यालय, ब्रिगेडियर सुमर वीर सिंह, पीवीसी प्रशासन, डॉ. शिव प्रताप वर्मा, रजिस्ट्रार, शिक्षकगण और विद्यार्थी उपस्थित रहे। चर्चा का समापन आदिवासी ज्ञान और संस्कृति के संरक्षण, सामुदायिक जीवन को मजबूत करने, सतत विकास को बढ़ावा देने तथा आदिवासी युवाओं के लिए नए अवसर सृजित करने के साझा संकल्प के साथ हुआ, ताकि वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकें।




