चार धामों पर स्थिति हो गई साफ, हिंदुओं के साथ सिख, बौद्ध और जैन को ही एंट्री

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उत्तराखंड : उत्तराखंड के चार धामों में गैर हिंदुओं के प्रवेश को लेकर गंगोत्री मंदिर समिति समेत बीकेटीसी की ओर से स्थिति साफ की गई है। हिंदुओं के साथ सिख, जैन और बौद्ध धर्म वालों को प्रवेश मिलेगा। उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने इस फैसले को सही ठहराया है। कहा कि जिनकी देवी-देवताओं पर आस्था नहीं है, उनका चारधाम में क्या काम है।बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कहा कि केदारनाथ और बदरीनाथ धाम कोई पिकनिक स्पॉट नहीं हैं, बल्कि सनातन परंपरा के सर्वोच्च आध्यात्मिक केंद्र हैं। संविधान के अनुच्छेद 25 में स्पष्ट है कि सिख, जैन, बौद्ध सनातन परंपरा के अंग हैं। अनुच्छेद 26 हमें यह अधिकार देता है कि हम अपनी धार्मिक परंपराओं और पूजा-पद्धति की रक्षा करें। यह निर्णय किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, अनुशासन और शुद्धता के संरक्षण के लिए है। उत्तराखंड में पर्यटन के लिए हजारों स्थल खुले हैं, ऐसे में धामों की पहचान बदलना आस्था के साथ अन्याय होगा। जो व्यक्ति सनातन परंपरा में आस्था रखता है, वह अपनी आस्था के अनुसार आगे बढ़ सकता है, लेकिन धाम की मूल धार्मिक पहचान से समझौता नहीं किया जा सकता।मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि धामों के संचालन से जुड़े धार्मिक संगठनों, तीर्थ पुरोहितों और संत समाज की राय के आधार पर ही सरकार आगे फैसला लेगी। उन्होंने कहा कि इन स्थलों के लिए पहले से बने कानूनों का अध्ययन किया जा रहा है और उसी के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।केदारनाथ-बद्रीनाथ धाम में हर साल देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इसी वजह से एंट्री बैन से जुड़ा कोई भी कदम सीधे यात्रियों पर असर डाल सकता है।

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2025 के यात्रा सीजन में रिपोर्ट के मुताबिक केदारनाथ धाम में 16,56,539 श्रद्धालु पहुंचे, जबकि बद्रीनाथ धाम में करीब 16.5 लाख श्रद्धालुओं ने दर्शन किए। यह आंकड़े बताते हैं कि दोनों धामों से जुड़ा कोई भी फैसला सिर्फ उत्तराखंड नहीं, पूरे देश के यात्रियों से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति का गठन द यूपी श्री बद्रीनाथ और श्री केदारनाथ टेंपल एक्ट 1939 के तहत किया गया था। यह कानून मंदिरों के बेहतर प्रशासन और प्रबंधन के लिए बनाया गया था।

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इस अधिनियम में समिति की संरचना, उसके अधिकार, मंदिर संचालन, व्यवस्था बनाए रखने और नियम बनाने से जुड़ी बातें तय की गई हैं। यानी समिति के पास मंदिरों के प्रशासन और व्यवस्था को लेकर निर्णय लेने का अधिकार इसी कानून के तहत आता है।

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