आदिवासी दर्शन से विश्व मंच तक, डॉ. रामदयाल मुंडा की विरासत आज भी प्रेरणा






रांची : 23 अगस्त को डॉ. रामदयाल मुंडा की जयंती पर उन्हें संस्कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी, झारखंड आंदोलनकारी, विचारक, लेखक और प्राध्यापक के रूप में याद किया जा रहा है। डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्माता मेघनाथ के अनुसार, 1970 के दशक में अमेरिका में पढ़ाई और अध्यापन करने के बाद डॉ. मुंडा ने झारखंड लौटकर काम करने का फैसला किया। वे आदिवासी जीवनदर्शन और विचारधारा के साथ जुड़े रहे, लेकिन उनकी स्वीकार्यता सभी वर्गों में थी। बीमारी से पहले दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने आदिवासी विचारधारा के लिए काम करने वाले गैर-आदिवासी लोगों को भी सम्मानित किया था, जिनमें रमणिका गुप्ता, डॉ. रमेश शरण और डॉ. बीडी शर्मा शामिल थे।


प्रो. संजय बसु मलिक ने 1994 की जर्मनी यात्रा का संस्मरण साझा करते हुए बताया कि डॉ. मुंडा ने रात में घर की सभी बत्तियां बुझा दी थीं। जब गृहस्वामी ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि बिजली उत्पादन में कोयला जलता है, जंगल कटते हैं और नदियां प्रदूषित होती हैं, इसलिए जरूरत न होने पर बिजली बचानी चाहिए। यह छोटी-सी आदत वहां के गृहस्वामी के लिए भी सीख बन गई।
डॉ. मुंडा के बेटे गुंजल इकिर मुंडा ने बताया कि अमेरिका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी और उनके कार्यस्थलों के दौरे ने उन्हें अपने पिता के बौद्धिक विकास को समझने का अवसर दिया। उन्होंने डॉ. मुंडा के गुरु डॉ. नॉर्मन जाइड से भी मुलाकात की। गुंजल के अनुसार, उनके पिता ने कभी अपनी इच्छाएं उन पर नहीं थोपीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और विचारों ने उन्हें अपने जीवन की दिशा तय करने की प्रेरणा दी।


