सोना देवी विश्वविद्यालय में नशामुक्ति जागरूकता कार्यक्रम, युवाओं को डिजिटल लत से बचने का संदेश

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JHARKHAND: युवाओं को नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करने, डिजिटल लत से बचाने तथा उनमें सकारात्मक चिंतन, आत्मानुशासन और स्वस्थ जीवनशैली विकसित करने के उद्देश्य से सोना देवी विश्वविद्यालय, घाटशिला के सभागार में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, जमशेदपुर के तत्वावधान में नशामुक्ति जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में नशामुक्त जीवन, मानसिक स्वास्थ्य, डिजिटल अनुशासन और राजयोग मेडिटेशन के महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने विद्यार्थियों से अपनी ऊर्जा, प्रतिभा और समय का सदुपयोग शिक्षा, व्यक्तित्व विकास तथा राष्ट्र निर्माण में करने का आह्वान किया।
यह कार्यक्रम भारत सरकार के नशा मुक्त भारत अभियान एवं मिशन स्पंदन के उद्देश्यों के अनुरूप आयोजित किया गया। इसके माध्यम से ‘10 करोड़ नशामुक्त भारत का संकल्प’ संदेश को जन-जन तक पहुंचाने तथा युवाओं को नशामुक्त समाज के निर्माण में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया।

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कार्यक्रम का संचालन संस्कृत विभाग की सहायक अध्यापिका सुश्री कुमारी निकिता ने किया। उन्होंने विषय का परिचय देते हुए कहा कि वर्तमान समय में नशामुक्ति का अर्थ केवल मादक पदार्थों से दूरी बनाना ही नहीं, बल्कि उन आदतों पर भी नियंत्रण रखना है, जो हमारी एकाग्रता, समय और मानसिक शांति को प्रभावित करती हैं। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को जागरूक, अनुशासित और लक्ष्य के प्रति समर्पित बनाकर ही एक स्वस्थ समाज की नींव मजबूत की जा सकती है।

डिजिटल नशे से दूर रहकर लक्ष्य पर केंद्रित हों युवा : वी.के. नेहा
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की वक्ता बहन वी.के. नेहा ने कहा कि भारत को विश्वगुरु बनाने का सपना तभी साकार होगा, जब देश का युवा शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त होगा। युवाओं को अपनी क्षमताओं को पहचानते हुए सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि नशे की लत व्यक्ति की सोच, निर्णय क्षमता और भविष्य को प्रभावित करती है। आज डिजिटल नशा और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग भी युवाओं की एकाग्रता एवं कार्यक्षमता के लिए चुनौती बन रहा है।
उन्होंने विद्यार्थियों से मोबाइल और सोशल मीडिया का उपयोग आवश्यकता के अनुसार करने तथा अपने समय को शिक्षा, रचनात्मक कार्यों और आत्मविकास में लगाने की अपील की। उन्होंने कहा कि आत्मानुशासन और सकारात्मक दृष्टिकोण के माध्यम से युवा अपनी ऊर्जा को सही दिशा दे सकते हैं और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं।

एकाग्रता और मानसिक स्थिरता से बेहतर होगा व्यक्तित्व विकास : बहन ऊषा
विशेषज्ञ बहन ऊषा जी ने डिजिटल नशे के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि मोबाइल फोन का अनियंत्रित उपयोग, इंटरनेट पर अत्यधिक निर्भरता और सोशल मीडिया की लत धीरे-धीरे व्यक्ति की एकाग्रता, कार्यक्षमता और मानसिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि हमारा ध्यान जिस दिशा में केंद्रित होता है, उसी के अनुरूप हमारे विचार, व्यवहार और व्यक्तित्व का विकास होता है।
उन्होंने विभिन्न गतिविधियों और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से विद्यार्थियों को एकाग्रता का महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि एक समय में कई कार्यों को एक साथ करने की कोशिश करने के बजाय किसी एक कार्य पर पूरी एकाग्रता के साथ ध्यान देने से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं और विषय की समझ अधिक स्पष्ट होती है। मानसिक स्थिरता की कमी व्यक्ति को विचलित कर सकती है, जबकि नियमित अभ्यास और एकाग्रता से कार्यक्षमता में सुधार लाया जा सकता है।
बहन ऊषा ने मस्तिष्क की न्यूरोप्लास्टिसिटी की अवधारणा को भी सरल तरीके से समझाया। उन्होंने कहा कि नियमित अभ्यास, सकारात्मक सोच और अच्छी आदतों के माध्यम से सीखने की क्षमता तथा व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को डिजिटल उपकरणों का विवेकपूर्ण उपयोग करने, समय का प्रबंधन करने और अपनी दिनचर्या में अध्ययन, ध्यान तथा रचनात्मक गतिविधियों को प्राथमिकता देने की सलाह दी।

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राजयोग मेडिटेशन से मन को शांत और आत्मबल को मजबूत बनाने का संदेश
अतिथि बहन रूपा दी ने राजयोग मेडिटेशन के माध्यम से नशामुक्ति, मानसिक शांति और आध्यात्मिक सशक्तीकरण का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी नकारात्मक आदत से मुक्त होने के लिए मन को शांत, स्थिर और दृढ़ बनाना आवश्यक है। ध्यान के अभ्यास से व्यक्ति अपने विचारों को सकारात्मक दिशा दे सकता है तथा आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति विकसित कर सकता है।
उन्होंने जीवन में सुख, शांति, प्रेम, आनंद, पवित्रता, शक्ति और ज्ञान जैसे सात गुणों को अपनाने पर जोर दिया। उनके अनुसार, जब व्यक्ति अपने जीवन में इन गुणों को स्थान देता है, तो उसके विचारों और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है।
बहन रूपा दी ने राजयोग ध्यान का अभ्यास कराते हुए विद्यार्थियों को आत्मस्वरूप का अनुभव करने और सकारात्मक संकल्पों को अपनाने की विधि बताई। उन्होंने ‘मैं शांत स्वरूप आत्मा हूं’, ‘शांति मेरा स्वधर्म है’, ‘मैं सुखी एवं भाग्यशाली आत्मा हूं’ जैसे संकल्पों के माध्यम से मन को शांत रखने तथा आत्मबल बढ़ाने का अभ्यास कराया। उन्होंने कहा कि नियमित ध्यान व्यक्ति को तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी संतुलित रहने और सही निर्णय लेने में सहायता कर सकता है। ‘ॐ शांति’ के आध्यात्मिक संदेश के साथ उन्होंने सभी को आंतरिक शांति और सकारात्मकता को जीवन का हिस्सा बनाने के लिए प्रेरित किया।

शिक्षा के साथ चरित्र निर्माण भी विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी : अर्चना सिंह
विश्वविद्यालय की सहायक कुलसचिव श्रीमती अर्चना सिंह ने कहा कि विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके चरित्र, व्यवहार और जीवन मूल्यों का विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नशे की लत व्यक्ति के स्वास्थ्य, शिक्षा और पारिवारिक जीवन को प्रभावित कर सकती है। इसलिए युवाओं को शुरुआत से ही स्वस्थ आदतें अपनाने और अपने भविष्य के प्रति जिम्मेदार बनने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय परिसर में इस प्रकार के जागरूकता कार्यक्रम विद्यार्थियों को सही दिशा प्रदान करते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से नशे से दूर रहने, अनुशासित दिनचर्या अपनाने तथा अपने साथियों को भी सकारात्मक जीवनशैली के लिए प्रेरित करने की अपील की।

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सकारात्मक सोच और आत्मानुशासन से निर्धारित करें जीवन की दिशा : डॉ. नीत नयना
विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. नीत नयना ने कहा कि विद्यार्थी जीवन भविष्य की नींव तैयार करने का महत्वपूर्ण समय है। इस दौरान विकसित की गई आदतें व्यक्ति के व्यक्तित्व और जीवन की दिशा को प्रभावित करती हैं। नशे की आदत और डिजिटल माध्यमों का अनियंत्रित उपयोग विद्यार्थियों की पढ़ाई, एकाग्रता और निर्णय क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
उन्होंने कहा कि तनाव या किसी समस्या का सामना करने पर युवाओं को गलत आदतों का सहारा लेने के बजाय अपने शिक्षकों, परिवार और मित्रों से संवाद करना चाहिए। नियमित अध्ययन, योग, ध्यान, खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियां मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक होती हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से समय का सदुपयोग करने, सकारात्मक सोच विकसित करने और अपने लक्ष्यों के प्रति निरंतर प्रयासरत रहने का आह्वान किया।

स्वस्थ युवा ही विकसित भारत की असली शक्ति : कुलपति प्रो. डॉ. ब्रज मोहन पाट पिंगुवा
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर डॉ. ब्रज मोहन पाट पिंगुवा ने कहा कि युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति और भविष्य की आशा होते हैं। देश की प्रगति के लिए आवश्यक है कि युवा स्वस्थ, जागरूक, अनुशासित और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहें। नशे की लत न केवल व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को प्रभावित करती है, बल्कि उसके परिवार और समाज पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का दायित्व विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ उनमें नैतिक मूल्यों, सामाजिक जिम्मेदारी और आत्मानुशासन की भावना विकसित करना भी है। उन्होंने विद्यार्थियों से नशे से दूर रहने, तकनीक का सकारात्मक उपयोग करने और अपनी ऊर्जा को ज्ञान, कौशल तथा रचनात्मक गतिविधियों के विकास में लगाने की अपील की।
कुलपति ने यह भी संदेश दिया कि मानसिक स्वास्थ्य और सकारात्मक चिंतन को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। ध्यान, नियमित दिनचर्या और संतुलित जीवनशैली अपनाकर विद्यार्थी अपनी एकाग्रता बढ़ा सकते हैं तथा चुनौतियों का सामना अधिक आत्मविश्वास के साथ कर सकते हैं।

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नशामुक्त भारत का संकल्प हर नागरिक की जिम्मेदारी : कुलाधिपति प्रभाकर सिंह
विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री प्रभाकर सिंह ने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि नशामुक्त युवा ही स्वस्थ, समृद्ध और सशक्त भारत की मजबूत नींव हैं। युवाओं को अपने जीवन का स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित कर अनुशासन, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए। नशे की लत व्यक्ति की प्रतिभा और संभावनाओं को कमजोर करती है, जबकि स्वस्थ आदतें उसे अपने लक्ष्य तक पहुंचने की शक्ति प्रदान करती हैं।
श्री सिंह ने कहा कि भारत को विश्वगुरु बनाने का संकल्प तभी साकार हो सकता है, जब देश का युवा शारीरिक रूप से स्वस्थ, मानसिक रूप से सशक्त और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण हो। उन्होंने डिजिटल नशे के प्रति जागरूक करते हुए कहा कि मोबाइल और सोशल मीडिया का उपयोग ज्ञान, शिक्षा और रचनात्मकता बढ़ाने के लिए होना चाहिए। तकनीक हमारी सहायक बने, न कि हमारी एकाग्रता, समय और वास्तविक जीवन के संबंधों पर हावी हो जाए।
उन्होंने आगे कहा कि नशामुक्ति केवल व्यक्तिगत संकल्प नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। परिवार, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक संगठनों को मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए, जिसमें युवा स्वस्थ आदतें अपनाएं और अपनी प्रतिभा का उपयोग समाज तथा राष्ट्र की उन्नति में करें। उन्होंने विद्यार्थियों से स्वयं नशामुक्त रहने के साथ-साथ दूसरों को भी जागरूक करने तथा नशामुक्त भारत के संकल्प को जनआंदोलन बनाने में योगदान देने का आह्वान किया।

नशामुक्त जीवन अपनाने की दिलाई गई शपथ
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी सदस्यों को नशामुक्त जीवन अपनाने तथा समाज को नशे के दुष्प्रभावों से मुक्त बनाने के लिए शपथ एवं प्रतिज्ञा दिलाई गई। उपस्थित लोगों ने नशे से दूर रहने और अपने परिवार, मित्रों तथा समाज के अन्य सदस्यों को भी जागरूक करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि नशामुक्ति, डिजिटल अनुशासन, सकारात्मक चिंतन और राजयोग मेडिटेशन को जीवन का हिस्सा बनाकर स्वस्थ, सुखी एवं सफल जीवन की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। इस पहल ने विद्यार्थियों को अपने स्वास्थ्य, समय और भविष्य के प्रति सजग रहने तथा एक जागरूक, जिम्मेदार और नशामुक्त समाज के निर्माण में सहभागी बनने की प्रेरणा दी।

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