आदित्यपुर नगर निगम में “राधा सांडिल पार्ट-2” की चर्चा, निगम की सरकार के उदय की छठियारी भी नहीं हुई की विवाद में है मेयर संजय सरदार


आदित्यपुर: आदित्यपुर नगर निगम की राजनीति एक बार फिर पुराने विवादों और कथित “वसूली तंत्र” की चर्चा से गर्म हो गई है। नए मेयर संजय सरदार के कार्यकाल को लेकर शहर में तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। राजनीतिक गलियारों में लोग इसे सीधे पूर्व मेयर राधा सांडिल के दौर की वापसी बता रहे हैं।
वर्ष 2013 से 2018 तक राधा सांडिल के कार्यकाल में महादेव महतो का नगर निगम में जबरदस्त प्रभाव माना जाता था। ठेकेदारों, कर्मचारियों और अफसरों के बीच उनकी पकड़ को लेकर कई तरह की चर्चाएं आम थीं। लेकिन वक्त बदला और आज वही राधा सांडिल राजनीतिक गुमनामी में चली गई हैं। नगर निगम की सत्ता से दूर होने के बाद उनका राजनीतिक प्रभाव लगभग खत्म हो चुका है। शहर में यह भी चर्चा है कि लगातार विवादों और राजनीतिक अलगाव के कारण वह डिप्रेशन जैसी स्थिति से गुजर रही हैं।
अब 2026 में इतिहास खुद को दोहराता दिख रहा है। मेयर संजय सरदार को भी पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा खेमे का करीबी माना जाता है। आरोप लग रहे हैं कि नगर निगम में फिर कमीशनखोरी, दबाव की राजनीति और कथित अवैध वसूली का माहौल बनता जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक के नेता तंज कसने से पीछे नहीं हट रहे।
ताजा मामला क्षेत्र के एक बिल्डर से जुड़ा है, जो आरएसबी कंपनी के लिए काम कर रहा बताया जा रहा है। चर्चा है कि मेयर संजय सरदार के दबाव में उस बिल्डिंग के खिलाफ नगर निगम से नोटिस जारी कराया गया। इस कार्रवाई के बाद शहर में सवाल उठने लगे हैं कि क्या निगम का इस्तेमाल विकास के लिए हो रहा है या दबाव बनाने के लिए? सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर मेयर की खूब किरकिरी हो रही है।
इधर पहले से वायरल भोजपुरी रील विवाद ने भी मेयर की छवि को झटका दिया है। भाई के अंतिम संस्कार से लौटने के दौरान भोजपुरी गाने पर बनाई गई रील को लेकर लोग अब भी सवाल उठा रहे हैं। जनता का कहना है कि शहर को गंभीर नेतृत्व चाहिए, न कि विवादों में घिरा चेहरा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पूर्व मेयर विनोद श्रीवास्तव और रीता श्रीवास्तव के कार्यकाल में नगर निगम अपेक्षाकृत संतुलित तरीके से चला था। अधिकारियों से तालमेल बनाकर योजनाओं को धरातल पर उतारने की कोशिश हुई थी। मगर अब शहर में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या आदित्यपुर फिर उसी पुराने “पावर और प्रेशर” वाली राजनीति की तरफ लौट रहा है?
फिलहाल आदित्यपुर की गलियों से लेकर राजनीतिक चौपाल तक एक ही चर्चा है—
“क्या नगर निगम में फिर वही पुराना खेल शुरू हो चुका है?”



