19 साल सेवा के बाद भी नौकरी अधर में, नियमितीकरण की मांग लेकर हाईकोर्ट पहुंचीं ANM कर्मी


रांची : झारखंड में वर्षों से अनुबंध पर कार्यरत एएनएम स्वास्थ्यकर्मियों ने अब अपने नियमितीकरण की मांग को लेकर झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। रागिनी कुमारी, लक्ष्मी हेम्ब्रम, हेमा कोंगारी समेत कुल 34 महिला स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा दायर सिविल रिट याचिका में राज्य सरकार और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की नई बहाली प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। इन स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि उन्होंने पिछले 10 से 19 वर्षों तक राज्य के विभिन्न जिलों में लगातार सेवा दी, लेकिन इसके बावजूद उन्हें स्थायी नौकरी का लाभ नहीं दिया गया।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार वे वर्ष 2007, 2008, 2009 और 2013 से स्वास्थ्य विभाग एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत कार्यरत हैं। उन्होंने पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां, रांची, गुमला सहित कई दूरदराज और दुर्गम इलाकों में सेवाएं दी हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान भी इन महिलाओं ने फ्रंटलाइन वर्कर के रूप में अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों की सेवा की। इसके बावजूद सरकार ने नियमितीकरण की नीति बनाने के बजाय JSSC के माध्यम से ‘झारखंड एएनएम प्रतियोगिता परीक्षा-2025’ के तहत नई बहाली प्रक्रिया शुरू कर दी।
याचिका में स्वास्थ्यकर्मियों ने आरोप लगाया है कि सरकार उनसे करीब दो दशक तक सेवा लेने के बाद अब उन्हें नए अभ्यर्थियों के साथ प्रतियोगी परीक्षा में बैठने के लिए मजबूर कर रही है, जो उनके साथ अन्याय है। उन्होंने कहा कि नई भर्ती प्रक्रिया में अनुभव का वेटेज अधिकतम 10 वर्षों तक सीमित कर दिया गया है, जबकि कई ANM कर्मियों ने 19 वर्षों तक लगातार सेवाएं दी हैं। इसके अलावा 13 मई 2026 को जारी शॉर्टलिस्ट सूची में पारदर्शिता नहीं होने, कट-ऑफ और आरक्षण रोस्टर स्पष्ट नहीं करने तथा 10वीं-12वीं के अंकों को अधिक महत्व देने पर भी सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से मांग की है कि वर्षों से सेवा दे रहीं सभी अनुबंध एएनएम कर्मियों को नियमित किया जाए और जब तक मामले पर अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक JSSC विज्ञापन संख्या 03/2025 के तहत चल रही पूरी भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए। साथ ही उन्होंने सरकार को अनुबंध स्वास्थ्यकर्मियों के समायोजन और नियमितीकरण के लिए स्पष्ट नीति बनाने का निर्देश देने की मांग की है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के ‘उमा देवी’ और ‘एम.एल. केसरी’ मामलों का हवाला देते हुए कहा गया है कि 10 वर्ष से अधिक समय तक स्वीकृत पदों पर कार्यरत कर्मियों को एकमुश्त नियमितीकरण का लाभ मिलना चाहिए। मामले में राज्य के मुख्य सचिव, स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव, स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक, NHM मिशन निदेशक और JSSC अध्यक्ष को प्रतिवादी बनाया गया है। अब इस पूरे मामले पर झारखंड हाईकोर्ट के फैसले पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।



