SIT की जांच में नोएडा अथॉरिटी और पुलिस के दावों की खुली पोल

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Noida: पापा, मैं नाले में गिर गया हूं, मैं मरना नहीं चाहता… मुझे बचा लीजिए!’ ये वो आखिरी शब्द थे जो सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता ने 16 दिसंबर की उस काली रात अपने पिता से कहे थे. कोहरे की घनी चादर, हड्डियों को कंपा देने वाली ठंड और सामने मौत की तरह खड़ा निर्माणाधीन बेसमेंट का 20 फीट गहरा गड्ढा. युवराज करीब दो घंटे तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करता रहा, मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाकर मदद की गुहार लगाता रहा, लेकिन उत्तर प्रदेश का भारी-भरकम प्रशासनिक अमला उसे बचाने में नाकाम रहा. आज युवराज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी मौत ने नोएडा अथॉरिटी, पुलिस और रेस्क्यू सिस्टम पर ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब देना अब मुश्किल हो रहा है.युवराज मेहता की मौत के मामले में शासन द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) ने अपनी जांच की रफ्तार तेज कर दी है. शनिवार को नोएडा प्राधिकरण और पुलिस विभाग ने SIT को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नोएडा प्राधिकरण और पुलिस विभाग ने 600 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी है. इस जांच में SIT का मुख्य फोकस उस ‘रिस्पॉन्स टाइम’ पर है, जिसने एक हंसते-खेलते नौजवान को लाश में बदल दिया.जांच टीम ने घटनाक्रम, ड्यूटी रोस्टर, कंट्रोल रूम रिकॉर्ड और कॉल डिटेल्स को खंगाला है. सूत्रों के मुताबिक, जब SIT ने पूछा कि रेस्क्यू में 2 घंटे की देरी क्यों हुई, तो अधिकारियों के पास कोई ठोस जवाब नहीं था.

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