167 सृजन‌ संवाद में दो स्वर्ण कमल पुरस्कृत लेखकों से वार्ता

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JHARKHAND: सृजन संवाद की 167वीं गोष्ठी का आयोजन ऑनलाइन माध्यम से किया गया, कार्यक्रम स्ट्रीमयार्ड पर हुआ और फेसबुक लाइव के जरिए प्रसारण किया गया। यह यूट्यूब पर उपलब्ध होगा। यह करीम सिटी कॉलेज मासकॉम विभाग तथा न्यू डेल्ही फ़िल्म फ़ाउंडेशन के सहयोग से हुआ। स्ट्रीमयार्ड संचालन डॉ विजय शर्मा ने किया। साहित्य और सिनेमा जगत से जुड़े कई साथियों ने इसमें भाग लिया। सृजन संवाद ‘समय और सिनेमा- 3’ में राष्ट्रीय पुरस्कृत फ़िल्म लेखक द्वै मनमोहन चड्ढ़ा एवं अपूर्व शर्मा मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। डॉ. नेहा तिवारी संवादी तथा डॉ. विजय शर्मा की भूमिका में थीं। शुरुआत में डॉ. विजय शर्मा ने अतिथियों, दर्शकों का स्वागत एवं परिचय दिया और सत्र की रूपरेखा प्रस्तुत की। बताया, मनमोहन चड्ढ़ा की किताब ‘हिन्दी सिनेमा का इतिहास’ एवं अपूर्व शर्मा की ‘लाइट एंड शेडोज इन असमीज सिनेमा’ राष्ट्रीय स्वर्ण कमल पुरस्कार प्राप्त हैं। दोनों लेखक सिनेमा के साथ-साथ साहित्य तथा शिक्षण में भी सक्रिय हैं। असम के निवासी अपूर्व शर्मा असमी कहानी केलिए साहित्य अकादमी से भी पुरस्कृत हैं। चड्ढ़ा पुणे के फ़िल्म संस्थान में कार्यरत हैं।

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अपूर्व शर्मा ने पहले असमिया फ़िल्मकार ज्योति प्रसाद अग्रवाल की जीवनी ‘द लोन रेंजर इन ए फ़ोरसेकेन फ़्रन्टीयर’ लिखी है। डॉ. नेहा तिवारी के प्रश्न का उत्तर देते हुए शर्मा ने ज्योति प्रसाद अग्रवाल और उनकी बनाई फ़िल्म ‘जयमती’ के विषय में विस्तार से बताया। वे थोड़े व्यथित हैं कि ज्योति प्रसाद अग्रवाल द्वारा निर्मित उत्कृष्ट फ़िल्म ‘जयमती’ असम के बाहर के लोगों का ध्यान आकर्षित न कर सकी। जबकि इसका सिनेमैटिक सिनेरियो अपने समय से बहुत आगे का है।

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इस फ़िल्म का कोई प्रिंट उपलब्ध नहीं है, अत: साक्ष्य के अभाव में इसकी आधिकारिकता सिद्ध नहीं की जा सकती है। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि किताब लिखने में उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इसके लिए उन्हें ज्योति प्रसाद के परिवार एवं डॉ. भूपेन हजारिका से काफ़ी मदद मिली। राजस्थानी ज्योति प्रसाद का परिवार असम में न केवल बस गया, यहाँ की जीवन शैली, सभ्यता-संस्कृति में पूरी तरह ढ़ल गया है। महात्मा गाँधी से प्रेरित ज्योति प्रसाद ने स्कॉटलैंड और जर्मनी में फ़िल्म बनाने का प्रशिक्षण लिया। उन्होंने अभिनय भी किया था।

दूसरे वक्ता मनमोहन चड्ढा मुख्य रूप से देहरादून के निवासी हैं। काफ़ी कम उम्र से उन्हें सिनेमा और साहित्य का चस्का लग गया। उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं में काम किया। पुणे, फ़िल्म संस्थान ने उनका जीवन बदल दिया। वहाँ का वातावरण, लाइब्रेरी बहुत समृद्ध है। फ़िल्म प्रशिक्षण के बाद उन्होंने इसी संस्थान में शिक्षण प्रारंभ कर दिया। उन्होंने कई फ़िल्में बनाई। वे दूरदर्शन पर प्रसारित लोकप्रिय सीरियल ‘हमलोग’ से बतौर सह-निर्देशक जुड़े थे। पुणे की लाइब्रेरी एवं आर्काइव में बैठ कर अपनी किताब ‘हिन्दी सिनेमा का इतिहास’ लिखी। यह किताब फ़िल्म विभागों के पाठ्यक्रम में शामिल है और निरंतर पठन-पाठन में उपयोग की जाती है। अब इसका नया संस्करण मध्य प्रदेश ग्रंथ अकादमी से प्रकाशित है।

दर्शकों के प्रश्न के उत्तर में शर्मा ने कहा, सिनेमा पर लिखने केलिए डॉयरेक्टर का इतिहास जानना जरूरी है साथ ही उसके व्यू प्वाइंट को समझना होगा। सिनेमा के इन्साक्लोपीडिया चड्ढा ने फ़िल्म पर लिखने केलिए सिनेमा के इतिहास को जानने, खूब पढ़ने एवं विश्व की उच्च कोटि की फ़िल्म देखने का सुझाव दिया।

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सदा की तरह दर्शकों के प्रश्न एवं टिप्पणियों से कार्यक्रम को आगे बढ़ने में सहायता मिली। डॉ. तिवारी ने सबको धन्यवाद दिया। 167 सृजन संवाद में जमशेदपुर से साहित्य कला फाउंडेशन की डॉ. क्षमा त्रिपाठी, डॉ. मीनू रावत, वीणा कुमारी, अरविन्द तिवारी, अर्चना अनुपम कर्ण, आभा विश्वकर्मा, दिल्ली से न्यू डेल्ही फ़िल्म फ़ाउंडेशन के संस्थापक आशीष कुमार सिंह, रमेश कुमार सिंह, राजेश बिजरोनिया, कोचीन से डाल्टन क्रिस्टोफ़र, असम से अपूर्व शर्मा, बैंग्लोर से पत्रकार अनघा मारीषा, कवि परमानंद रमण, पुणे से सिने-विश्लेषक एवं इतिहासकार मनमोहन चड्ढ़ा, झारखंड से प्रमोद कुमार बर्णवाल, वर्धा से समालोचक अमरेंद्र कुमार शर्मा आदि सम्मिलित हुए।

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