मानव जीवन में गृहस्थ आश्रम से महत्वपूर्ण कोई आश्रम नहीं है : जीयर स्वामी

Advertisements
Advertisements

https://www.youtube.com/watch?v=BX6D5EUncic

Advertisements
https://bashisthaonline.in
Advertisements

बिक्रमगंज/रोहतास:- मानव जीवन में गृहस्थ आश्रम से महत्वपूर्ण कोई आश्रम नहीं है । यह आश्रम गृहस्थ को धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरूषार्थ-फल प्राप्त कराता है । गृहस्थ जीवन में रहकर भी भगवान का सानिध्य सुगमता पूर्वक प्राप्त किया जा सकता है । समाज में अधिक संख्या गृहस्थों की है । जो गृहस्थ अपने को परमात्मा से जोड़ना चाहता है, उसे शास्त्र-वर्जित आहार-व्यवहार नहीं अपनाना चाहिए । जिस गृहस्थ के घर में छह प्रकार के सुख नहीं हैं, वह गृहस्थ कहलाने का अधिकारी नहीं है । गृहस्थ आश्रम से भिन्न ब्रह्मचर्य आश्रम और सन्यास आश्रम का पालन करना कठिन है । उपरोक्त बातें श्री लक्ष्मीप्रपन्न जीयर स्वामी ने बिक्रमगंज प्रखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत जमोरी गांव के मां काली मंदिर परिसर में एकदिवसीय ज्ञानयज्ञ में प्रवचन करते हुए कहीं । स्वामी जी ने कहा कि सभी आश्रमों में गृहस्थ आश्रम श्रेष्ठ माना गया है । गृहस्थ आश्रम छह सुख आवश्यक है । गृहस्थ आश्रम में सात्विक कर्मों से धन की वृद्धि होनी चाहिए । रोग मुक्त जीवन होना चाहिए । सुन्दर स्त्री होनी चाहिए । सिर्फ रुप-रंग से नहीं बल्कि आचरण और वाणी से भी सुन्दर होनी चाहिए । पुत्र अज्ञाकारी होना चाहिए । अर्थ का उपार्जन वाली शिक्षा अध्ययन होना चाहिए । स्वामी जी ने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए अगर ये सुख उपलब्ध नहीं हैं, तो अपने को सच्चा गृहस्थ नहीं मानें । गृहस्थ आश्रम में पुत्र की चर्चा करते हुए स्वामी जी ने कहा कि अगर चार भाई हैं और एक भाई को भी संतान है तो अन्य तीनों भाई भी पुत्र के अधिकारी हो जाते हैं । पुत्र से अभिप्राय केवल तनय से नहीं बल्कि भाई के पुत्र भी आप के पुत्र हुए । गृहस्थ आश्रम के लिए कोई निर्धारित वस्त्र है । वे किसी तरह का मर्यादित वस्त्र धारण कर सकते हैं । लेकिन संत का आचरण और वस्त्र उनके पहचान होते हैं । स्वामी जी ने कहा कि धर्म के दस लक्षण हैं । यानि धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, स्वच्छता, इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध ये धर्म के लक्षण हैं । स्वच्छता की चर्चा करते हुए स्वामी जी ने कहा कि स्वच्छता का तात्पर्य बाहरी और भीतरी स्वच्छता से है । भगवान बार-बार कहते हैं कि जिसका मन निर्मल रहता है, उसे ही मैं अंगीकार करता हूं । सार्वजनिक स्थलों पर मल-मूल का त्याग नहीं करना चाहिए । गुरु और भगवान का स्मरण करते हुए पूरब मुंह करके स्नान करना चाहिए । स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य को तीन तरह का यज्ञ प्रतिदिन करना चाहिए । देव यज्ञ, ऋषि यज्ञ और पितृ यज्ञ । देव यज्ञ से अभिप्राय स्नान-ध्यान कर भगवान का नाम कीर्तन करने से है । वैदिक सद्रग्रंथों को स्वाध्याय और मनन ऋषि यज्ञ है । पितृ यज्ञ से अभिप्राय अतिथि सेवा, गो सेवा एवं ब्राह्ममण सेवा आदि है । मौके पर ज्ञान यज्ञ स्थल पर वीर बहादुर सिंह , गजेंद्र सिंह, किशोर बीडी पासवान , जितेंद्र तिवारी , पारस तिवारी शिक्षक , भरथ राय , संजय सिंह , मृत्युंजय सिंह , बब्लू राय , सोनू सिंह , सुनील सिंह , मिंटू सिंह सहित हजारों श्रद्धालु लोग उपस्थित थे ।

Advertisements

You may have missed