टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग पर बढ़ा दबाव, आरबीआइ ने नियमों पर स्थिति की स्पष्ट

जमशेदपुर : टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग का मामला एक बार फिर चर्चा में है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक धन तक प्रत्यक्ष या परोक्ष पहुंच रखने वाली बड़ी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) और मुख्य निवेश कंपनियों (सीआइसी) के लिए आरबीआइ में पंजीकरण जरूरी है. वहीं, ऊपरी स्तर की एनबीएफसी श्रेणी में आने वाली कंपनियों को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना भी अनिवार्य है. शुक्रवार को नयी दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि ऐसी कंपनियां समूह की अन्य कंपनियों के वित्तीय संसाधनों और बहीखातों के आधार पर धन जुटाती हैं, जिससे सार्वजनिक धन से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं. हालांकि, जिन मुख्य निवेश कंपनियों की सार्वजनिक धन तक प्रत्यक्ष या परोक्ष पहुंच नहीं है, उन्हें पंजीकरण से छूट मिल सकती है.

टाटा संस को सितंबर 2022 में ऊपरी स्तर की एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत किया गया था. इसके बाद कंपनी ने मार्च 2024 में आरबीआइ से पंजीकरण से बाहर निकलने के लिए आवेदन किया और इस श्रेणी से बाहर आने की पात्रता हासिल करने के लिए अपना कर्ज भी चुका दिया. हालांकि, पिछले महीने आरबीआइ ने कंपनी की पंजीकरण प्रमाणपत्र लौटाने की अर्जी खारिज कर दी. इस फैसले के बाद लिस्टिंग की संभावना बढ़ गई है. टाटा संस का निदेशक मंडल संभावित लिस्टिंग से जुड़े कदम आगे बढ़ा चुका है, लेकिन समूह के भीतर मतभेदों के बीच कंपनी ने दूसरे विकल्पों पर भी विचार करने की बात कही है.
कार्यक्रम में आरबीआइ गवर्नर ने महंगाई, आर्थिक वृद्धि और रुपये की विनिमय दर पर भी बात की. उन्होंने कहा कि महंगाई को निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप रखना, कीमतों में स्थिरता बनाए रखना और दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि को समर्थन देना केंद्रीय बैंक की प्राथमिकताएं हैं. सीमेंट और इस्पात की बिक्री, कर्ज वृद्धि, कर संग्रह तथा वाहन बिक्री जैसे संकेतकों को उन्होंने आर्थिक गतिविधियों की मजबूती का संकेत बताया, जबकि खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों से जुड़े आपूर्ति पक्ष के दबाव को चुनौती माना. उन्होंने चालू वर्ष के लिए औसत महंगाई दर का अनुमान 5.1 प्रतिशत बताया. रुपये को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया कि आरबीआइ किसी निश्चित विनिमय दर को लक्ष्य नहीं बनाता, बल्कि विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित स्थिति बनाए रखने और रुपये के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने पर ध्यान देता है.


