घरजमाई बनने की इच्छा को पति ने बताया मानसिक क्रूरता, हाई कोर्ट ने तलाक की अपील की खारिज


रांची : पत्नी की ओर से पति के घरजमाई बनकर पटना में रहने की इच्छा जताने को मानसिक क्रूरता बताते हुए दायर तलाक की अपील झारखंड हाई कोर्ट ने खारिज कर दी। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने राहुल चौबे की अपील पर फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल पत्नी की पति को घरजमाई बनाने की इच्छा वैवाहिक क्रूरता नहीं है। पति-पत्नी की शादी 21 नवंबर 2008 को पटना में हुई थी और दोनों की एक बेटी भी है।


पति के मुताबिक, पत्नी 24 फरवरी 2013 को पटना गई और इसके बाद हजारीबाग स्थित ससुराल नहीं लौटी। पति का आरोप था कि पत्नी और उसके माता-पिता चाहते थे कि वह पटना में उनके साथ घरजमाई बनकर रहे। उसने यह कहते हुए इससे इनकार किया कि उसके माता-पिता वृद्ध और बीमार हैं तथा उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। पति ने दावा किया कि उसने पत्नी को कई बार वापस लाने की कोशिश की, लेकिन वह पटना में ही रहने पर जोर देती रही। इसी आधार पर उसने इसे मानसिक प्रताड़ना बताते हुए हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक मांगा।
मामले में पत्नी की ओर से पेश अमिकस क्यूरी ने पति के आरोपों को खारिज किया। पत्नी का कहना था कि उसने पति या उसके परिवार के साथ कोई क्रूरता नहीं की, बल्कि उसे पति और ससुरालवालों की ओर से प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। उसने यह भी कहा कि वह शादी खत्म नहीं करना चाहती और पति के साथ सम्मानपूर्वक रहना चाहती है। फैमिली कोर्ट ने 2022 में पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा। हाई कोर्ट ने कहा कि मायके जाना पत्नी का अधिकार है, जबकि घरजमाई बनना या नहीं बनना पति की अपनी पसंद है।


