सर दोराबजी टाटा: जिन्होंने राष्ट्र के निर्माण की नींव उसके जन्म से पहले ही रख दी

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JHARKHAND: महानता का एक रूप वह भी है, जो प्रशंसा की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि शांतिपूर्वक राष्ट्र निर्माण की नींव मजबूत करता रहता है। सर दोराबजी टाटा इसी निःस्वार्थ भावना के प्रतीक थे। उन्होंने बीहड़ जंगलों में स्टील प्लांट में तब्दील कर औद्योगिक भारत की नींव रखी; पीड़ितों के लिए अस्पताल, जिज्ञासु मनों के लिए प्रयोगशालाएं और सपने देखने वाले युवाओं के लिए खेल के मैदान तैयार किए।जमशेदजी नसरवानजी टाटा ने जिस आत्मनिर्भर भारत का सपना देखा था, उसे साकार होते देखने से पहले ही उनका निधन हो गया। उनके अधूरे सपने और विशाल विरासत की जिम्मेदारी उनके बड़े बेटे दोराबजी टाटा के कंधों पर आ गई। यह दायित्व किसी भी साधारण व्यक्ति के लिए असाधारण चुनौती हो सकता था, लेकिन दोराबजी ने इसे अपने संकल्प, दूरदृष्टि और नेतृत्व से एक महान अवसर में बदल दिया। अगस्त 2026 में, जब हम सर दोराबजी टाटा की जयंती मना रहे हैं, भारत अपने खेल इतिहास के एक महत्वपूर्ण पड़ाव की ओर बढ़ रहा है—2027 में भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) के शताब्दी वर्ष की ओर। अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत की भागीदारी के प्रबल समर्थक सर दोराबजी टाटा ने 1920 के एंटवर्प ओलंपिक में भारत की ऐतिहासिक भागीदारी के लिए व्यक्तिगत रूप से आर्थिक सहयोग दिया और खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया। उनके इन अग्रणी प्रयासों ने भारत में संगठित ओलंपिक आंदोलन की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आगे चलकर 1927 में भारतीय ओलंपिक संघ की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके वे इसके पहले अध्यक्ष बने।आज, टाटा स्टील सर दोराबजी टाटा की खेल विरासत को नई ऊंचाइयों तक ले जा रही है। 5 विश्वस्तरीय खेल अकादमियों, हाई परफार्मेंस सेंटर, टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन और जमीनी स्तर से लेकर उच्च प्रदर्शन स्तर तक फैले 16 प्रशिक्षण एवं फीडर केंद्रों के माध्यम से कंपनी 19 खेल विधाओं में प्रतिभाओं को निखार रही है। टाटा फुटबॉल अकादमी (TFA) ने अब तक 300 से अधिक कैडेट्स को प्रशिक्षित किया है, जिनमें 150 से अधिक खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय टीम का प्रतिनिधित्व किया है। वहीं, टाटा स्टील फाउंडेशन के फुटबॉल ट्रेनिंग सेंटर झारखंड की अंडर-14 और अंडर-16 बालक टीमों के लिए बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली खिलाड़ी तैयार कर रहे हैं। टाटा आर्चरी अकादमी ने पिछले 25 वर्षों में 180 से अधिक कैडेट्स को प्रशिक्षण दिया है और देश को 8 ओलंपियन दिए हैं। इस बीच, नवल टाटा हॉकी अकादमी 3 रीजनल डेवलपमेंट सेंटर और 32 ग्रासरूट स्तर के केंद्र संचालित करती है। कंपनी तीरंदाजी, हॉकी, स्पोर्ट क्लाइम्बिंग और रोइंग जैसे खेलों में विश्व स्तरीय खेल अकादमियों का संचालन करती है और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देने के लिए प्रमुख मैराथन एवं शतरंज प्रतियोगिताओं का आयोजन भी करती है। सर दोराबजी टाटा से प्रेरणा लेते हुए, कंपनी ज़मीनी स्तर पर फुटबॉल और उत्कृष्ट एथलीटों के विकास के लिए लगातार निवेश बढ़ा रही है तथा बुनियादी अवसंरचना का विस्तार कर रही है।चाहे आधुनिक उद्योग की नींव रखने की बात हो या भारतीय खेलों को नई पहचान दिलाने की, सर दोराबजी टाटा ने ऐसी दूरदर्शी विरासत का निर्माण किया, जिसकी गूंज आज भी राष्ट्र की प्रगति में सुनाई देती है। सीमित पूंजी, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और औपनिवेशिक शासन की उदासीनता जैसी अनेक चुनौतियों के बावजूद, उन्होंने साकची में भारत के पहले बड़े इस्पात संयंत्र की स्थापना के सपने को साकार किया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जब टिस्को ने लगभग 2,90,000 टन इस्पात की आपूर्ति की, तो इस औद्योगिक केंद्र को ब्रिटिश शासन द्वारा उनके पिता जमशेदजी नसरवानजी टाटा के सम्मान में ‘जमशेदपुर’ नाम दिया गया। बाद में आए गंभीर आर्थिक संकट के समय इस उद्यम को बचाने के लिए सर दोराबजी और लेडी मेहरबाई ने अपनी पूरी निजी संपत्ति, यहां तक कि प्रसिद्ध जुबली डायमंड भी, गिरवी रख दिया। उनके नेतृत्व में संयंत्र का पांच गुना विस्तार हुआ। 1920 की बड़ी श्रमिक हड़ताल के दौरान भी उन्होंने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप कर संवाद और समझदारी के माध्यम से स्थिति को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाया।लेकिन सर दोराबजी का राष्ट्र-निर्माण का दृष्टिकोण इस्पात तक सीमित नहीं था। उन्होंने पश्चिमी घाटों में तीन जलविद्युत कंपनियों की स्थापना के माध्यम से टाटा पावर की नींव मजबूत की, भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के विकास में महत्वपूर्ण सहयोग दिया और ‘सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट’ की स्थापना की। इस ट्रस्ट के सहयोग से आगे चलकर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS), टाटा मेमोरियल अस्पताल, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) और नेशनल सेंटर फॉर द परफॉर्मिंग आर्ट्स (NCPA) जैसे देश के अग्रणी संस्थानों की स्थापना हुई।1932 में जब सर दोराबजी टाटा का निधन हुआ, तब वे अपने पीछे केवल उद्योगों और संस्थानों की विरासत नहीं, बल्कि एक ऐसे भारत की मजबूत नींव छोड़ गए थे, जो स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की दिशा में पहले से कहीं अधिक तैयार था। उनकी 167वीं जयंती पर यह कुछ पल ठहरकर उन्हें याद करने का अवसर है—और साथ ही यह समझने का भी कि जब एक जीवन स्वयं से बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित हो जाता है, तो वह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को किस तरह बदल सकता है।

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