इमरजेंसी के 50 साल बाद भी याद है वो रात जब भारत थम गया था…


लोक आलोक न्यूज़ संपादकीय ( अभिषेक मिश्रा) :- 25 जून 1975 की वो रात भारतीय लोकतंत्र पर काली चादर बनकर छा गई जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लागू कर दिया और पूरी व्यवस्था को रातों-रात चुप करा दिया, दिल्ली से लेकर दरभंगा तक, पटना से लेकर पुणे तक, हर जगह टेलीफोन लाइनें काट दी गईं, प्रेसों पर ताले जड़ दिए गए, और विपक्षी नेताओं को बिना वारंट गिरफ्तार कर लिया गया, देशभर में एक डर का माहौल बन गया, चारों तरफ एक सन्नाटा, एक खामोशी, लेकिन इसी खामोशी में कुछ आवाज़ें थीं जो दब नहीं सकीं, कुछ चेहरे थे जो झुके नहीं, और कुछ नौजवान थे जिन्होंने कब्रिस्तान को क्रांति का अड्डा बना दिया, हां आपने सही सुना – कब्रिस्तान, वो भी मीटिंग के लिए, वो दौर ऐसा था जब घर की दीवारें भी डर से थर्रा जाती थीं, लोग अपने ही घरों में बोलने से डरते थे, लेकिन उस डर को चीरते हुए बिहार, यूपी, मध्यप्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में युवाओं ने लोकतंत्र की मशाल को जलाए रखा, विरोध की रणनीति ऐसी कि सरकार की आंखों से भी ओझल, पटना, छपरा, सासाराम, बनारस और इलाहाबाद जैसे शहरों में युवाओं ने गुप्त ठिकाने बनाए, कब्रिस्तान, श्मशान घाट, वीरान मंदिर, टूटे-बिखरे मकान – यही बन गए उनके क्रांति के अड्डे, रात के अंधेरे में हाथों में लालटेन लिए, कुछ युवाओं की टोली एक-एक कर इकट्ठा होती, फुसफुसाहट में चर्चा होती, कोई नारा नहीं, कोई पोस्टर नहीं, पर जोश वही था जो क्रांतिकारी आंदोलनों में होता है, और सबसे बड़ी बात ये थी कि उस वक्त न सोशल मीडिया था, न मोबाइल फोन, न ऑनलाइन क्रांति, फिर भी यह आंदोलन इतिहास बन गया, और उस इतिहास की सबसे प्रतीकात्मक घटना थी – इंदिरा गांधी की तस्वीरों का उतरना, जी हां, जब 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी और इमरजेंसी समाप्त हुई, तब गांव-गांव, शहर-शहर लोगों ने अपने घरों की दीवारों से इंदिरा गांधी की तस्वीरों को उतार फेंका, कहीं उन्हें जूते मारे गए, कहीं जलाया गया, और कहीं उनके नीचे लिखा गया – “लोकतंत्र जिंदाबाद”, ये वो भावनात्मक विद्रोह था जो वर्षों की पीड़ा और घुटन के बाद बाहर आया, ये वो गुस्सा था जो नसबंदी, सेंसरशिप, जेलों में डाले गए हजारों युवाओं और अभिव्यक्ति की हत्या के खिलाफ था, इमरजेंसी के दौरान अखबारों पर सेंसर लगाया गया, इंडियन एक्सप्रेस ने अपने एडिटोरियल कॉलम को खाली छोड़ दिया ताकि लोग समझ सकें कि कैसे सरकार ने कलम को कैद कर दिया है, रामनाथ गोयनका, कुलदीप नैयर, प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों ने अपनी लेखनी से व्यवस्था की पोल खोली, लेकिन लाख दबाव के बावजूद भी सच्चाई बाहर आई, और तब देश को समझ में आया कि लोकतंत्र कोई दीवार पर टंगी परिभाषा नहीं, बल्कि हर उस आवाज का नाम है जो अन्याय के खिलाफ खड़ी होती है, इमरजेंसी में न सिर्फ विपक्ष बल्कि आम नागरिक भी जेलों में डाले गए, संजय गांधी के नेतृत्व में जबरन नसबंदी अभियान चलाया गया, लाखों गरीब और मजदूरों को पकड़कर अस्पताल ले जाया गया, किसी की मर्जी नहीं पूछी गई, और यह अत्याचार इतना व्यापक था कि उसने पूरे उत्तर भारत को झकझोर कर रख दिया, खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश में इसका जबरदस्त विरोध हुआ, और इस विरोध की कमान संभाली युवाओं ने, जिनमें से कई आगे चलकर देश के बड़े नेता बने – जैसे लालू प्रसाद यादव, नितीश कुमार, सुशील मोदी, ये वो छात्र थे जिन्होंने जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ आह्वान पर घर छोड़ दिया, जेल गए, लाठियाँ खाईं, लेकिन हार नहीं मानी, पटना यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों से हजारों छात्र आंदोलन में उतरे, उनमें से कई भूमिगत हो गए, पर्चे छपते थे – हैंड प्रेस से, बांटे जाते थे रात में, और सुबह पुलिस आती थी तो केवल शब्दों की गूंज बची होती थी, महिलाएं भी पीछे नहीं रहीं, गांवों में महिलाएं संदेशवाहक बन गईं, शहरों में लड़कियाँ पोस्टर चिपकाती रहीं, और जब कोई पकड़ा जाता था तो भी मुस्कराता था क्योंकि उन्हें पता था कि वे लोकतंत्र के लिए लड़ रहे हैं, 1977 में जब चुनाव हुए तो जनता ने बता दिया कि भारत में सत्ता के ऊपर संविधान है, और संसद के ऊपर जनता की अदालत है, जनता पार्टी ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की और इंदिरा गांधी पहली बार खुद अपनी सीट भी हार गईं, ये वो समय था जब पूरे देश ने चैन की सांस ली, लेकिन साथ ही खुद से एक वादा भी किया – कभी फिर ऐसा नहीं होने देंगे, अब 50 साल बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो सवाल उठता है कि क्या आज का युवा उतना ही सजग है? क्या हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को समझते हैं या केवल सोशल मीडिया पर नारों तक सीमित रह गए हैं? क्या सत्ता के अत्याचार के खिलाफ हम फिर से एकजुट हो सकते हैं या फिर हम भी इतिहास की एक तस्वीर बनकर रह जाएंगे? इमरजेंसी की ये कहानी केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, यह चेतावनी है, सबक है और प्रेरणा भी है, और उस प्रेरणा को सैल्यूट करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम अपने अधिकारों के लिए जागरूक रहें, सवाल पूछें, और जरूरत पड़े तो कब्रिस्तान में ही सही – मीटिंग करने को तैयार रहें, क्योंकि लोकतंत्र की ताकत संसद में नहीं, जनता के हौसले में होती है।




