जब कलम पर लगा ताला: इमरजेंसी में दबाई गई आवाज़ें, आज भी सांसें घुट रहीं हैं पत्रकारिता की

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Lok Alok News डेस्क | विशेष रिपोर्ट :- भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 25 जून 1975 एक ऐसा काला दिन था जब देश की आत्मा—उसकी आवाज़, उसकी कलम, उसकी पत्रकारिता—पर पहरा बिठा दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी और उसके साथ ही संविधान के अनुच्छेदों को ताक पर रखकर प्रेस की आज़ादी को जंजीरों में जकड़ दिया गया। सेंसरशिप लागू की गई, अखबारों की हेडिंग बदलवा दी गई, संपादकों को जेल में डाला गया, और टेलीप्रिंटर की लाइनें काट दी गईं। “इंडियन एक्सप्रेस” जैसे प्रतिष्ठित अखबारों ने जब विरोध जताने की कोशिश की तो उनके दफ्तरों की बिजली काट दी गई, “जनसंथा” के कार्यालय में छापे पड़े, और “स्टेट्समैन” को चेतावनी दी गई। मशहूर संपादक कुलदीप नैयर, लाजपत राय, रामनाथ गोयनका, और दूसरे कई पत्रकारों को या तो धमकाया गया या जेल की हवा खिलाई गई। वह दौर ऐसा था जब पत्रकारिता के अर्थ बदल गए—जो सरकार के खिलाफ बोले, वह देशद्रोही बना दिया गया।

पर सवाल यह है कि क्या सिर्फ आपातकाल में ही पत्रकारों की आज़ादी कुचली गई थी? जवाब है—नहीं! फर्क सिर्फ इतना है कि तब तानाशाही का एलान था, आज यह दबाव चुपचाप लोकतंत्र के लबादे में घुस आया है। आज भी जब पत्रकार सत्ता से सवाल करता है, तो उसके खिलाफ UAPA, देशद्रोह, मानहानि या माफिया कनेक्शन जैसे गंभीर धाराएं थोप दी जाती हैं। कश्मीर से लेकर मणिपुर तक, बिहार से महाराष्ट्र तक—आज भी असहमति की आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों को या तो नौकरी से निकाला जा रहा है, ट्रोल किया जा रहा है, या सीधे जेल भेजा जा रहा है।

बीते कुछ वर्षों में पत्रकारों पर हमलों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 2023 में भारत पत्रकार सुरक्षा के मामले में दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में शामिल हुआ, और प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में गिरकर 161वें स्थान पर पहुँच गया। झारखंड में रूपेश कुमार सिंह, कश्मीर में इरफान मेहराज, और दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकारों पर एनआईए और ईडी की रेड्स—ये घटनाएं बताती हैं कि सिर्फ आपातकाल की सेंसरशिप ही नहीं, आज का ‘डिजिटल सेंसरशिप’, ‘एडवर्टाइजिंग ब्लैकमेल’, और ‘टारगेटेड केस’ भी किसी तानाशाही से कम नहीं।

दूसरी तरफ, मीडिया के बड़े हिस्से को ‘गोदी मीडिया’ कहा जाने लगा है। जो पत्रकार सरकार के सवाल पूछते हैं, उन्हें “एंटी नेशनल” कहा जाता है। कई वरिष्ठ पत्रकारों को टीवी डिबेट से बाहर कर दिया गया, कई अखबारों के एडिटोरियल पेज पर सेंसरशिप लागू कर दी गई, और सोशल मीडिया पर ‘फैक्ट चेक’ के नाम पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा दिया गया है।

आज के दौर में पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा संकट उसकी विश्वसनीयता और स्वतंत्रता का है। पत्रकारिता जो कभी सत्ता के खिलाफ जनता की आवाज़ होती थी, आज खुद सत्ता के साथ खड़ी दिखाई देती है। और जो पत्रकार जनता के साथ खड़ा होता है, वह या तो मारा जाता है, या जेल में डाल दिया जाता है, या फिर आर्थिक रूप से खत्म कर दिया जाता है।

इमरजेंसी में तो जनता जानती थी कि प्रेस पर ताला है, लेकिन आज तो कई बार जनता को यह तक नहीं पता चलता कि असल खबर क्या है और कौन उसे रोक रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले पहरा वर्दी वाला होता था, आज पहरा विज्ञापन वाला है।

निष्कर्ष में बस इतना कहना काफी होगा कि आज भी कलम पर हमले जारी हैं, बस हथियार और चेहरे बदल गए हैं। इमरजेंसी की सेंसरशिप खुली थी, आज की सेंसरशिप नकाब में है — मगर दोनों में पत्रकार की आज़ादी दम तोड़ रही है।

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