एनआईटी जमशेदपुर में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न: महिला शिक्षा को संस्कार, भारतीय दृष्टि, मूल्यबोध एवं सामाजिक सरोकारों से जोड़ने पर जोर

जमशेदपुर: राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) जमशेदपुर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “महिला शिक्षा और संस्कार : परंपरा, परिवर्तन और भविष्य-दृष्टि” का गुरुवार को गरिमामय वातावरण में समापन हुआ। 9 एवं 10 सितंबर को आयोजित इस संगोष्ठी में देश भर के प्रख्यात शिक्षाविदों, विचारकों एवं विशेषज्ञों ने महिला शिक्षा के ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं समकालीन आयामों पर गहन मंथन किया।
महिला शिक्षा के ऐतिहासिक एवं भारतीय परिप्रेक्ष्य पर मंथन
संगोष्ठी के दूसरे दिन के प्रथम चरण में “महिला शिक्षा : ऐतिहासिक, सामाजिक परिप्रेक्ष्य और भारतीय पाठ्यक्रम की दृष्टि” विषय पर तृतीय सत्र का आयोजन किया गया। सत्र का कुशल संचालन डॉ. एकादशी जी (महाराष्ट्र) ने किया। मुख्य वक्ता के रूप में दौलतराम महाविद्यालय, नई दिल्ली की प्राचार्या प्रो. सविता रॉय ने महिला शिक्षा के ऐतिहासिक व सामाजिक विकास तथा भारतीय पाठ्यक्रम की दृष्टि पर अपने सारगर्भित विचार रखे।
सत्र के उपरांत आयोजित परिचर्चा में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की महिला कार्य संरक्षक एवं सौराष्ट्र विश्वविद्यालय, राजकोट (गुजरात) की पूर्व कुलपति प्रो. नीलांबरी जी ने अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। सत्र का धन्यवाद ज्ञापन न्यास की झारखंड प्रांत विषय संयोजिका डॉ. ललिता राणा ने किया।
समकालीन चुनौतियाँ और समाधान
इसके उपरांत “समकालीन चुनौतियाँ और समाधान” विषय पर चतुर्थ सत्र आयोजित हुआ, जिसका संचालन श्रीमती मोमी सैकिया (गुवाहाटी) ने किया। अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज एवं डीपीएस जमशेदपुर की प्रतिनिधि अरुणिमा मिश्रा ने मुख्य वक्ता के रूप में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महिलाओं के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों और उनसे दृढ़तापूर्वक मुकाबला करने की आवश्यकता पर बल दिया। सत्र का धन्यवाद ज्ञापन सुश्री मोनिका आभा (अमरकंटक) द्वारा प्रस्तुत किया गया।
समारोप सत्र: महिला नेतृत्व एवं शिक्षा की ऐतिहासिक परंपरा पर विमर्श
डॉ. कविता परमार के संचालन में आयोजित भव्य समारोप सत्र की शुरुआत प्रो. नीलांबरी जी के स्वागत भाषण से हुई।
माननीय कुलपति प्रो. सरोज शर्मा का मुख्य संबोधन:
समारोप सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रांची विश्वविद्यालय की माननीय कुलपति प्रो. सरोज शर्मा ने महिला शिक्षा एवं नेतृत्व के ऐतिहासिक व समकालीन परिप्रेक्ष्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महिलाएं आज आधी आबादी का सशक्त नेतृत्व करने वाली शक्ति बन चुकी हैं। उन्होंने साझा किया कि रांची विश्वविद्यालय में प्राप्त कुल गोल्ड मेडल में लगभग 10 प्रतिशत मेडल छात्राओं ने हासिल किए हैं, जो उच्च शिक्षा में बालिकाओं की उल्लेखनीय प्रगति और बढ़ती उपलब्धि का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
प्रो. शर्मा ने भारतीय ज्ञान परंपरा का स्मरण कराते हुए कहा कि हमारे देश में महिलाओं के ज्ञान, शास्त्रार्थ और विमर्श की परंपरा सदियों पुरानी है। ऋषि याज्ञवल्क्य और विदुषी मैत्रेयी के संवाद जैसे अमर उदाहरण प्रमाणित करते हैं कि भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं की बौद्धिक सहभागिता अत्यंत समृद्ध रही है। उन्होंने स्मृति एवं मनु परंपरा के संदर्भ में पुत्री के अधिकारों तथा शिक्षा, राजनीति और न्याय व्यवस्था में महिलाओं की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित किया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हर बड़े परिवर्तन की नींव छोटे-छोटे प्रयासों से ही रखी जाती है। प्रकृति ने मानव समाज को भविष्य की पीढ़ियों के निर्माण और संरक्षण का दायित्व सौंपा है, इसलिए महिला शिक्षा को इस व्यापक सामाजिक जिम्मेदारी के साथ जोड़ना अनिवार्य है।
नारी समाज और राष्ट्र की धुरी: मुख्य अतिथि श्री शिवपूजन पाठक
समारोप सत्र के मुख्य अतिथि एवं झारखंड राज्य सूचना आयोग के सूचना आयुक्त श्री शिवपूजन पाठक ने नारी को समाज और राष्ट्र का केंद्रबिंदु बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में नारी को प्रकृति तत्व और साक्षात शक्ति माना गया है। सामाजिक आंदोलनों को दिशा देने और समाज के पुनरुत्थान में नारी की भूमिका सदैव अग्रणी रही है। मातृत्व और स्त्रीत्व दोनों के संरक्षण व सम्मान की पैरवी करते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक महिला को अपने निर्णयों और आचरण के प्रति सजग रहना चाहिए, क्योंकि उसके निर्णयों का प्रभाव आगामी पीढ़ियों पर पड़ता है। उन्होंने आधुनिकता के साथ परिवार और सामाजिक ताने-बाने को सुदृढ़ रखने की आवश्यकता पर बल दिया।
शिक्षा का उद्देश्य: स्वतंत्रता और संस्कार में संतुलन
सत्र की अध्यक्षता करते हुए शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की राष्ट्रीय सह-सचिव एवं झारखंड राज्य विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सविता सेंगर ने कहा कि हमें आत्ममंथन करना होगा कि वास्तव में “महिला शिक्षा से हम चाहते क्या हैं?” उन्होंने स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के अंतर को स्पष्ट करते हुए शिक्षा को ज्ञान, विवेक, संस्कार और दायित्वबोध से जोड़ने का आह्वान किया। प्रो. सेंगर ने कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में महिलाओं को यह समझना होगा कि क्या चुनना है और क्यों चुनना है, जिससे वे सत्य और असत्य का भेद पहचानकर उचित निर्णय ले सकें।
समारोह का समापन
कार्यक्रम के अंतिम चरण में सम्मेलन संयोजिका एवं कोल्हान विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डॉ. शुक्ला मोहंती ने संगोष्ठी के सफल आयोजन, व्यवस्था एवं कार्यप्रगति का विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। अंत में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के क्षेत्र संयोजक श्री विजय कुमार सिंह ने सभी अतिथियों, विद्वानों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व धन्यवाद ज्ञापित किया।
राष्ट्रगान के साथ इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का विधिवत समापन हुआ। संगोष्ठी से यह प्रमुख संदेश प्रसारित हुआ कि महिला शिक्षा को मात्र डिग्री और शैक्षणिक उपलब्धि तक सीमित न रखकर उसे संस्कार, भारतीय दृष्टि, विवेक, मूल्यबोध, सामाजिक उत्तरदायित्व एवं कुशल नेतृत्व के साथ एकाकार किया जाना चाहिए।




