टाटा स्टील ने सर दोराबजी टाटा की 164वीं जयंती मनाई गयी

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जमशेदपु: टाटा स्टील ने आज सर दोराबजी टाटा की 164वीं जयंती मनाई और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्हें याद किया और अगली पीढ़ी के लीडर्स को प्रेरित करने के लिए उनके जीवन और जीवनकाल पर एक पुस्तक लॉन्च की।

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सर दोराबजी टाटा, टाटा स्टील के पहले चेयरमैन थे, जिन्होंने कंपनी को कॉर्पोरेट गवर्नेंस में ऐसे मानक प्रदान किए जो अपने समय से कहीं आगे थे। उन्होंने कानूनी दायित्व बनने से बहुत पहले ही 8 घंटे दिन का कार्यदिवस, मातृत्व अवकाश, भविष्य निधि, दुर्घटना मुआवजा, निःशुल्क चिकित्सा सहायता और कई अन्य कल्याणकारी उपायों जैसी पहल की शुरुआत की थी।

जमशेदपुर में, इस अवसर पर आयोजित समारोह की शुरुआत सर दोराबजी टाटा पार्क में श्रद्धांजलि समारोह के साथ हुई। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में टाटा स्टील के कॉर्पोरेट सर्विसेज के वाईस प्रेसिडेंट चाणक्य चौधरी, विशिष्ट अतिथि के रूप में टाटा स्टील के पूर्व उप प्रबंध निदेशक (स्टील) डॉ टी मुखर्जी और सम्मानित अतिथि के रूप में टाटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष संजीव चौधरी उपस्थित थे। इस मौके पर टाटा स्टील और समूह की अन्य कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारी, यूनियन के सदस्य और जमशेदपुर के प्रतिष्ठित नागरिक भी उपस्थित थे।

इस अवसर को चिह्नित करने के लिए सर दोराबजी टाटा के जीवन और जीवनकाल पर आधारित एक कॉमिक बुक का विमोचन किया गया, जो प्रभा नायर और तृप्ति नैवाल द्वारा लिखित, अमर चित्र कथा प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रकाशित है। पुस्तक का विमोचन चाणक्य चौधरी, टी मुखर्जी, संजीव चौधरी, डेज़ी ईरानी और शुभ्रा मुखर्जी ने किया। यह पुस्तक विभिन्न स्कूलों के छात्रों को वितरित की जाएगी ताकि युवाओं को इससे प्रेरणा मिल सके। टाटा स्टील फाउंडेशन द्वारा संचालित मस्ती की पाठशाला और ब्रिज स्कूलों के छात्रों के साथ-साथ रोलर स्केटिंग ट्रेनिंग सेंटर, फुटबॉल ट्रेनिंग सेंटर और हैंडबॉल ट्रेनिंग सेंटर के खेल प्रशिक्षुओं ने भी आज के कार्यक्रम में भाग लिया।

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अपने संबोधन के दौरान, चाणक्य चौधरी ने कहा, “सामाजिक कल्याण, औद्योगिक विकास और राष्ट्र निर्माण के प्रति सर दोराबजी की प्रतिबद्धता उनके उल्लेखनीय चरित्र का प्रमाण है। उनकी दूरदर्शिता और समर्पण ने भावी पीढ़ियों को व्यवस्थित और वैज्ञानिक उन्नति में सक्षम बनाया और भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख प्लेयर के रूप में स्थापित किया। उनकी विरासत उद्योग के दायरे से परे तक फैली हुई है। श्रमिकों, उनके परिवारों और समुदायों के कल्याण के लिए उनकी गहरी चिंता ने कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के क्षेत्र में हमारी स्थायी प्रतिबद्धता की नींव रखी। सभा को संबोधित करते हुए, टाटा स्टील के पूर्व उप प्रबंध निदेशक (स्टील) टी मुखर्जी ने भारतीय विज्ञान संस्थान के महत्व पर बात की, जिसकी स्थापना सर दोराब जी टाटा ने की थी और इसने देश में विज्ञान और उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। टाटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष संजीव चौधरी ने यह भी उल्लेख किया कि कैसे सर दोराब जी टाटा ने मजदूरों की दुर्दशा को समझा और यूनियन को आगे बढ़ाने में मदद की।

सर दोराबजी टाटा का खेल के प्रति जुनून स्पष्ट था क्योंकि उन्होंने खेल और पार्कों के लिए क्षेत्र आरक्षित करने के अपने पिता के विज़न का अनुसरण करते हुए खेल को कंपनी के लोकाचार के साथ जोड़ दिया था। भारत को ओलंपिक में भाग लेते देखने की उनकी इच्छा के कारण 1920 में एंटवर्प ओलंपिक खेलों के लिए एथलीटों को प्रायोजन मिला। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप 1924 में पेरिस ओलंपिक में भारत के लिए जगह सुरक्षित हुई और अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति में उनकी नियुक्ति हुई। वह भारतीय ओलंपिक संघ के पहले अध्यक्ष थे।

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टाटा स्टील ने खेल को राष्ट्र निर्माण के लिए उत्प्रेरक मानकर उनकी विरासत को जारी रखा है। फुटबॉल, तीरंदाजी, एथलेटिक्स, हॉकी और स्पोर्ट क्लाइम्बिंग जैसे विभिन्न खेलों के लिए स्थापित अकादमियों के साथ, हम पूरे भारत में खेल प्रतिभाओं का पोषण करते हैं। सर दोराबजी टाटा की विरासत भविष्य में भी व्यवसायियों और उद्यमियों की पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

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