चुनावी जुमला बनकर रह गया है “86 बस्तियों को मालिकाना हक”, जब भूइयांडीह में बस्ती टूटा तो कोई नेता नहीं आया बचाने

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Saraikela  : जमशेदपुर में केवल चुनावी जुमला बनकर रह गया है “86 बस्तियों को मालिकाना हक”, लेकिन जब भूइयांडीह में बस्ती टूटने लगा तो कोई नेता नहीं बस्तीवासियों को बचाने नहीं पहुंचे. इस बात का मलाल बस्तीवासियों को है. बता दें कि जमशेदपुर के भुईयाडीह में नवंबर 2025 के अंत में JNAC के द्वारा हाईकोर्ट के सख्त आदेश पर बड़ा अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया गया. जिसमें भुईयाडीह सड़क किनारे की सैकड़ों के अवैध झुग्गियां और अनधिकृत निर्माण घरों को बुलडोजर से गिराए गए. जिससे कई परिवार बेघर हो गए हैं. बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई 2011 से लंबित PIL (2078/2018) के तहत कोर्ट के बार-बार निर्देशों का पालन का नतीजा थी. लेकिन सवाल उठता है कि प्रभावित लोगों को न नोटिस मिला, न पुनर्वास की व्यवस्था हुई लेकिन कड़ाके के ठंड में 120 परिवारों को बेघर कर दिया गया. इस कारवाई से भुईयाडीह, बिस्टुपुर और खाउ गली जैसे इलाकों में सैकड़ों परिवार सड़क पर आ गए है. जिससे शहर में अवैध कब्जे का पुराना मुद्दा फिर उजागर हुआ है. किंतु नेता प्रतिनिधि आज भी 86 बस्तियों का मालिकाना हक दिलाने का बात चुनाव आते ही अपने भाषणों में बोलते नजर आएंगे. आज परिस्थिति कुछ और है. आज से पिछले 25 वर्षों का रिकोर्ड देखें तो जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा में भाजपा नेता रघुवर विधायक (2000 से 2025 तक) कुर्सी में जमें रहें. वहीं निर्दलिय प्रत्याशी सरयू राय एक बार विधायक बनें लेकिन बस्तियों को मालिकाना का हक नहीं मिला.

– 2000: रघुबर दास (भाजपा)
– 2005: रघुबर दास (भाजपा)
– 2009: रघुबर दास (भाजपा)
– 2014: रघुबर दास (भाजपा)
– 2019: सरयू रॉय (निर्दलीय)
– 2024: पूर्णिमा दास साहू (भाजपा)

आज सवाल यह भी उठ रहा है कि कोई भी जनप्रतिनिधि चुनाव के वक्त सभी के लिए रोटी,कपड़ा और मकान की बात करतें हैं तो इनका मकान कहां है? मलिकाना हक के नाम पर  वोट लिया है, जवाब तो आपकों देना ही होगा. सरकार कोई भी रहें, या तो ऐसे सरकारी जमीनों में किसी को बसने ही मत दो, या बसे हैं तो उजाड़ो मत. इतनी जमीनें कहीं पर है तो पहले उन्हें कहीं बसा देते. उसके बाद उनके घरों में बुलडोजर चलवा देतें. ऐसे विकट परिस्थिति में रोज कमा कर खाने वाले गरीब मजदूर कहां जाएंगे ? इनसे ही तो जमशेदपुर शहर चलता है. कोई ओटो रिक्शा चलाता है. कोई किसी के घरों में दाईं का काम करतीं हैं,कोई ठेला लगाता है और कोई ऑटो चलाकर परिवार का पेट भारता है. इनके भी तो छोटे मासुम बच्चे हैं बूढ़े माता, पिता हैं आखिर वे कहां जाएंगे? उजाड़ना प्रशासन की कार्रवाई है तो फिर कर्तव्य भी तो है बसाने का. आज कुछ महिलाएं रोते हुए नंम आंखों से कह रहीं हैं. कई दिनों से बच्चों को लेकर सड़क किनारे बैठी हैं. इस कड़कते ठंड पर भी,रोते हुए आगे कहने लगी उनके सास-ससुर सबका जन्म यहीं हुआ है. आधार, राशन, पेंशन, वोटर_कार्ड, बिजली कनेक्शन,पानी कनेक्शन सब कुछ है फिर भी अवैध कब्जा कहकर घर तोड़ दिया गया.

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