महाराष्ट्र में भी मुस्लिमों के ‘मसीहा’ बने ओवैसी


महाराष्ट्र: महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने इस बार उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए राज्यभर में कुल 97 सीटों पर जीत दर्ज की है. पार्टी के लिए यह परिणाम पिछले चुनावों की तुलना में बड़ा उछाल माना जा रहा है.
AIMIM के नेता शारिक नक्शबंदी ने शुक्रवार को बताया कि पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के घर-घर जाकर चुनाव प्रचार करने और पिछली बार कई वार्डों में बहुत कम अंतर से मिली हार ने कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा पैदा की. उनके अनुसार, ‘ओवैसी साहब के कैंपेन ने कार्यकर्ताओं को भरोसा दिया कि इस बार हम स्थिति बदल सकते हैं और नतीजे यह दिखा रहे हैं कि वह आत्मविश्वास सही था.’मुस्लिम बहुल मालेगांव, जो पार्टी का एक और पारंपरिक गढ़ है. मालेगांव में AIMIM के उम्मीदवार 20 वार्ड सीटों पर आगे चल हैं. इस तरह मालेगांव में ओवैसी की सियासी पकड़ साफ नजर आ रही है. 2024 के विधानसभा चुनाव में मालेगांव से ओवैसी के एक विधायक भी जीतने में सफल रहे हैं.
मालेगांव नगर निगम चुनाव में कुल 84 सीटें है, जिसमें से ओवैसी को सबसे ज्यादा 20 सीट पर बढ़त है. बीजेपी को सिर्फ 2 सीटें तो शिंदे की शिवसेना को 18 सीट और कांग्रेस को सिर्फ 3 सीट पर बढ़त है. 41 सीटें अन्य के खाते में जाती दिख रही है, जिसमें करीब 6 सीटों पर सपा आगे चल रही है. इस तरह मालेगांव में ओवैसी के पार्टी के बिना किसी भी पार्टी का मेयर नहीं बन सकता है.नांदेड़ वाघाला नगर निगम में, एमआईएम ने 14 सीटों पर आगे चल रही या फिर जीत दर्ज कर चुकी है. इस तरह एक मज़बूत जगह बनाई है, जबकि धुले में पार्टी 8 सीटों पर आगे है. एमआईएम ने अमरावती में भी बढ़त बनाई है, जहां वह 6 सीटों पर उसके उम्मीदवार आगे चल रहे हैं या जीत चुकी है. चंद्रपुर में पार्टी ने अपना पहला प्रतिनिधि चुने जाने का रिकॉर्ड बनाया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सफलता AIMIM को महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में एक नई पहचान दे सकती है.
जालना नगर निगम से छोटी लेकिन प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण जीत मिली है, जहां एमआईएम ने 2 सीटें हासिल की हैं, और परभणी में, भी एक सीट जीती मिली है. इस तरह कुल मिलाकर, एमआईएम का प्रदर्शन, कुल 2,869 सीटों में से 75 सीटों पर जीत, उसके पारंपरिक गढ़ों से परे लगातार विस्तार का संकेत देता है. ये नतीजे पार्टी की ज़मीनी स्तर पर केंद्रित कैंपेन को शहरी स्तर पर चुनावी फायदे में बदलने की क्षमता को दिखाते हैं.




