“यह सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं — यात्रा अभी भी अधूरी है”: B. R. Gavai की पुरुषों से विशेष अपील

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दिल्ली: देश के मुख्य न्यायाधीश B. R. Gavai ने बुधवार को 30वें Sunanda Bhandare स्मृति व्याख्यान में कहा कि लैंगिक न्याय (gender justice) की दिशा में हमारी यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। उन्होंने विशेष रूप से पुरुषों को अपील की कि वे इस लड़ाई में सक्रिय साझीदार बनें — क्योंकि यह केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं है।

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उन्होंने कहा कि महिलाओं को केवल अधिकार देने-से काम नहीं चलेगा; असली बदलाव वहीं संभव है जहाँ पुरुष यह स्वीकार करें कि उनके पास जो-जो शक्ति (power) है, उसे साझा करना “हानि” नहीं बल्कि समाज की मुक्ति का मार्ग है।

CJI ने आगे बताया कि भारत में संवैधानिक समानता की यात्रा 75 साल से आगे बढ़ी है — पहले औपचारिक अधिकार, फिर गरिमा तथा स्वायत्तता का प्रश्न, और अब-ट्रांसजेंडर तथा क्वीयर (queer) अधिकारों तक का विस्तार हुआ है। लेकिन, उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि सिर्फ विधि-निर्णय-निर्माण से काम नहीं चलेगा, बल्कि सामाजिक बदलाव की मानसिकता भी ज़रूरी है।

CJI Gavai ने कहा, “लैंगिक समानता वाले भारत का मार्ग टकराव में नहीं, बल्कि सहयोग में निहित है।” उन्होंने इस दिशा में पुरुषों-महिलाओं दोनों को समान भागीदारी का आह्वान किया।उन्होंने न्यायपालिका-सामान्य जनता के संवाद की अहमियत भी रेखांकित की और कहा कि समानता अकेले कोर्ट के फैसलों से नहीं आई — बल्कि नागरिक समाज, महिलाओं-आंदोलनों और सक्रिय-नागर भागीदारी के कारण संभव हुई है।

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