जामडीह में ‘विकास’ सिर्फ बोर्ड पर, हकीकत में प्यास-अंधेरा-लाचारी: खाट पर दम तोड़ती जिंदगी, नाले का पानी-दीये की रोशनी, _जल जीवन मिशन फेल, सड़क नदारद, लाखों का अस्पताल-पावर सिस्टम बना शोपीस सांसद-विधायक, जिला प्रशासन से ग्रामीणों की गुहार – “अब तो सुन लीजिए साहब



JHARKHAND: महुआडांड़ की कलम से

लातेहार जिले के महुआडांड़ में आजादी के 78 साल बाद भी महुआडांड़ का जामडीह गांव विकास की बाट जोह रहा है। ओरसा पंचायत के इस आदिवासी बहुल गांव में सरकार की चार बड़ी योजनाएं दम तोड़ चुकी हैं। नल है पर जल नहीं, भवन है पर इलाज नहीं, वोट के लिए रास्ता है पर जिंदगी बचाने के लिए सड़क नहीं, और खंभे हैं पर रोशनी नहीं।
पानी: कागज में ‘हर घर नल’, जमीन पर ‘हर घर बीमार’
जल जीवन मिशन के तहत जामडीह को ‘नल-जल से आच्छादित’ घोषित किया गया है। पर गांव की जल मीनार सालों से सूखी पड़ी है। मोटर खराब, टंकी खाली और पाइपलाइन में जाले लगे हैं। मजबूरी में महिलाएं रोज 3 किलोमीटर पैदल चलकर चुआरी नाले से गंदा पानी लाती हैं। इसी पानी से खाना बनता है, बच्चे प्यास बुझाते हैं। नतीजा यह है कि हर दूसरे घर में उल्टी-दस्त, बुखार और पेट दर्द की शिकायत आम है। ग्रामीण बताते हैं कि कई बार शिकायत की, पर प्रखंड से लेकर जिले तक कोई झांकने नहीं आया। सवाल बड़ा है: लाखों का बजट खर्च हुआ, पर पानी गया कहां?
सड़क: चुनाव में 25 किमी पैदल, बीमारी में खाट पर मौत
जंगल-पहाड़ से घिरे जामडीह तक आज तक पक्की सड़क नहीं बनी। बरसात में गांव टापू बन जाता है। सबसे ज्यादा मार मरीजों पर पड़ती है। बीमार को खाट पर लादकर 15 से 25 किलोमीटर उबड़-खाबड़ रास्ता तय करना पड़ता है, तब कहीं गाड़ी नसीब होती है। ग्रामीण कहते हैं, “कई बार अस्पताल पहुंचने से पहले ही सांस टूट जाती है।” बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, किसान की फसल बाजार नहीं पहुंच पाती। हैरानी यह कि वोट देने के लिए यही ग्रामीण 25 किमी पैदल चलकर बूथ तक जाते हैं। पर वोट ले जाने वाले नेता फिर पलटकर नहीं देखते। भाजपा मंडल अध्यक्ष अमित जायसवाल का दावा है कि “बूढ़ा प्लान एक्शन” के तहत दो साल पहले टेंडर हो चुका है और 2-3 महीने में काम शुरू होगा। पर ग्रामीण पूछ रहे हैं, “दो साल से टेंडर ही सुन रहे हैं, सड़क कब देखेंगे?”
अस्पताल: लाखों का भवन, पर डॉक्टर के लिए तरसते लोग
गांव में बना प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अब मवेशियों का अड्डा बन गया है। लाखों की बिल्डिंग है, पर न डॉक्टर आता है, न नर्स दिखती है, न दवा मिलती है। पिछले रविवार एक मेहमान का 3 साल का बच्चा तेज बुखार से बेहोश हो गया। गांव में एक पैरासिटामोल तक नहीं थी। मजबूरी में परिजनों ने छत्तीसगढ़ से प्राइवेट डॉक्टर बुलाया। 4 घंटे बाद इलाज शुरू हुआ, तब जाकर बच्चे की जान बची। ग्रामीणों ने डॉक्टरों की स्थायी तैनाती की मांग की है।
बिजली: जरेडा का सिस्टम 2 महीने में फेल, गांव फिर अंधेरे में
सरकार ने जामडीह में बिजली आपूर्ति के लिए जरेडा के तहत सोलर सिस्टम लगवाया था। पर सिस्टम की गुणवत्ता ऐसी कि महज 1 से 2 महीने में ही पूरा प्रोजेक्ट फेल हो गया। खंभे और पैनल शोपीस बनकर खड़े हैं, लेकिन घरों में अंधेरा कायम है।
ग्रामीण आज भी दीये और ढिबरी की रोशनी में रात काटने को मजबूर हैं। बच्चों की पढ़ाई चौपट हो रही है। शाम ढलते ही गांव में सन्नाटा पसर जाता है। जंगली जानवरों का खतरा अलग से मंडराता रहता है। लाखों की योजना फिर कागजी खानापूर्ति बनकर रह गई।
सांसद-विधायक, जिला प्रशासन से एक ही पुकार: “अब तो जामडीह को देखिए”
ग्रामीणों ने सांसद कालीचरण सिंह, विधायक रामचंद्र सिंह और उपायुक्त संदीप कुमार से भावुक अपील की है। उनका कहना है कि अब बयान नहीं, जमीन पर कार्रवाई चाहिए। जल मीनार चालू हो, सड़क बने, अस्पताल में डॉक्टर आएं और घरों में रोशनी पहुंचे। जामडीह की हालत बता रही है कि आदिवासी इलाकों में योजनाएं सिर्फ फोटो खिंचाने और फाइल भरने का जरिया बन गई हैं। यहां हर बूंद पानी के लिए संघर्ष है, हर कदम पर खतरा है, हर सांस पर सवाल है और हर रात अंधेरे में कटती है।


