राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन के आखिरी दिन जमशेदपुर घोषणा पत्र जारी

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जमशेदपुर। तरुण भारत संघ, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद, जल बिरादरी, युगांतर भारती, नेचर फाउंडेशन, स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट तथा मिशनY के संयुक्त तत्वावधान में साकची स्थित मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल के ऑटियोरियम में लगातार दो दिनों तक मैराथन बैठक के उपरांत राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन में शनिवार को जमशेदपुर घोषणा पत्र जारी किया गया।
घोषणा पत्र में कहा गया कि हम, तरुण भारत संघ, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद, जल बिरादरी, युगांतर भारती, नेचर फाउंडेशन, स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट, मिशनY के प्रतिनिधि तथा 22 एवं 23 मई 2026 को जमशेदपुर में आयोजित राष्ट्रीय नदी एवं पर्वत सम्मेलन के समस्त प्रतिनिधिगण, भारत के पर्वतीय एवं नदी पारितंत्रों के संरक्षण, सुरक्षा एवं सतत प्रबंधन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः दृढ़ता से व्यक्त करते हैं।
घोषणापत्र में कुल 10 बिंदु हैं। पहले बिंदु में कहा गया कि हम यह स्वीकार करते हैं कि पर्वतीय पारितंत्र जल सुरक्षा, नदियों के पुनर्जीवन, जैव विविधता तथा करोड़ों लोगों की आजीविका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। दूसरे बिंदु में कहा गया कि हम उन पर्वतीय जलग्रहण क्षेत्रों एवं जलस्रोतों की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं, जो नदियों एवं भूजल भंडारों को पोषित करते हैं। तीसरे बिंदु के अनुसार, हम यह मान्यता देते हैं कि आदिवासी एवं स्थानीय पर्वतीय समुदाय पर्वतीय पारितंत्रों के प्रमुख संरक्षक हैं तथा पर्वतीय पारितंत्र प्रबंधन संबंधी उनके पारंपरिक ज्ञान का सम्मान एवं स्वीकार करते हैं। चौथे बिंदु में कहा गया है कि हम पर्वतीय क्षेत्रों को प्रभावित करने वाली गतिविधियों के दीर्घकालिक नियमन हेतु एक समग्र, पारितंत्र-आधारित एवं अधिकार-सम्मानित विधिक ढांचा विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
पांचवे बिंदु में कहा गया है कि हम नदियों एवं पर्वतों के अधिकार सुनिश्चित करने तथा उनके सुशासन हेतु संस्थागत व्यवस्थाएं स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसी प्रकार छठे बिंदु में हम भारत के पर्वतीय पारितंत्रों के लिए विधिक ढांचा तैयार करने हेतु देशव्यापी परामर्श आयोजित करने का संकल्प लेते हैं। सातवें बिंदु में कहा गया है कि इस घोषणा की तिथि से एक वर्ष के भीतर उक्त विधिक ढांचे के प्रारूप को तैयार करने का संकल्प लेने, आठवें बिंदु में नागरिक समाज संगठनों, शिक्षाविदों, पर्यावरण वैज्ञानिकों, समाज वैज्ञानिकों, विधिवेत्ताओं, आदिवासी समुदायों के प्रमुखों तथा अन्य हितधारकों से आग्रह करते हैं कि वे पर्वतीय पारितंत्रों के लिए विधिक ढांचे के निर्माण में सहयोग प्रदान करने, नौवें बिंदु में कहा गया कि हम राज्य सरकारों एवं भारत सरकार से आग्रह करते हैं कि विकसित किए गए इस विधिक ढांचे पर विचार कर इसे “पर्वत संरक्षण अधिनियम” के विधेयक के रूप में संबंधित विधानसभाओं तथा लोकसभा एवं राज्यसभा के समक्ष पारित करने हेतु प्रस्तुत करें। सबसे आखिरी, 10वें बिंदु के रुप में कहा गया कि हम इस घोषणा-पत्र को अंगीकृत करते हुए इसके प्रभावी क्रियान्वयन के प्रति स्वयं को समर्पित करते हैं।

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