शरीर में कांटे चुभाकर आस्था का प्रदर्शन, चड़क पूजा में दिखी तपस्या की अनोखी मिसाल

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सरायकेला-खरसावां : जिले के भुरकुली गांव में हर वर्ष की तरह इस बार भी पारंपरिक ‘चड़क पूजा’ का आयोजन अत्यंत श्रद्धा, साहस और तपस्या के साथ संपन्न हुआ। यह अनुष्ठान पाट संक्रांति के अवसर पर अपने चरम पर पहुंचा, जहां ‘भोक्ता’ कहलाने वाले श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य भगवान के प्रति अटूट आस्था का प्रदर्शन करते हुए कठिन तप साधना की।

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पूजा के दौरान श्रद्धालु अपने शरीर में लोहे के नुकीले कांटे चुभाकर ऊंचाई पर झूलते नजर आए। इसके साथ ही कई भक्त नंगे पैर जलते अंगारों पर चलते हुए और जीभ को लोहे की छड़ से छेदकर अपनी भक्ति और सहनशीलता का प्रदर्शन करते दिखे। इन कठिन अनुष्ठानों को देखने के लिए आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे, जिससे पूरा क्षेत्र आस्था और उत्साह से भर गया।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस परंपरा की शुरुआत करीब 118 वर्ष पूर्व हुई थी, जब वर्ष 1908 में गांव में एक शिवलिंग प्रकट हुआ था। तभी से यहां ‘विश्वनाथ महादेव’ की पूजा के साथ चड़क पूजा की परंपरा चली आ रही है। हालांकि आधुनिक समय में कुछ लोग इसे अंधविश्वास मानते हैं, लेकिन ग्रामीणों के लिए यह उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक एकता और गहरी आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है, जिसे वे अपनी अमूल्य धरोहर के रूप में संरक्षित कर रहे हैं।

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