NIT जमशेदपुर से राष्ट्रपति हुई असंतुष्ट… मंच से जाहिर की नाराजगी…

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जमशेदपुर:- जमशेदपुर स्थित एनआईटी में आयोजित दीक्षांत समारोह के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की नाराज़गी सामने आई है। सूत्रों के मुताबिक, मेडल वितरण के समय कॉलेज प्रबंधन ने छात्रों को ताली बजाने से मना कर दिया था। प्रबंधन का तर्क था कि यह राष्ट्रपति का पहला कार्यक्रम है और किसी भी तरह की औपचारिक गलती न हो जाए ।

लेकिन इस फैसले से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू असंतुष्ट दिखीं। उन्होंने साफ शब्दों में मंच से कहा— “देना ही तो लेना होता है। अगर आप दूसरों के लिए ताली नहीं बजाएंगे, तो आपके लिए कौन बजाएगा।” राष्ट्रपति की यह टिप्पणी सीधे तौर पर कॉलेज प्रबंधन की सोच पर सवाल खड़े करती है। सूत्र बताते हैं कि कार्यक्रम के बाद राष्ट्रपति नाराज़ होकर एनआईटी परिसर से लौटीं।

जिस इतिहास को बचाने के नाम पर ताली पर रोक लगाई गई, उसी व्यवस्था ने एनआईटी के इतिहास पर दाग लगा दिया। दीक्षांत समारोह जैसे गरिमामय मौके पर छात्रों की खुशी और सम्मान को दबा देना, कई लोगों को खटका है। जिसकी दबे जुबान चर्चा जोरों पर है।

एनआईटी प्रबंधन जिस “इतिहास” को रचने से डर रहा था, उसी डर ने उसके इतिहास पर सवालिया निशान लगा दिया। एक ऐसा संस्थान, जो देश को इंजीनियर और नेतृत्व देने का दावा करता है, वह सम्मान और संवेदना जैसे बुनियादी मूल्यों को भी प्रोटोकॉल की फाइलों में दबा कर बैठा रहा। जिससे यह ऐतिहासिक कार्यक्रम दीक्षांत समारोह कम और निर्जीव औपचारिकता अधिक बनकर रह गया।

आकाशवाणी चौक पर जनता से हुई रूबरू…



इसके उलट, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जो किया, उसने असली लोकतांत्रिक संस्कारों की मिसाल पेश कर दी। जनता के स्नेह से अभिभूत होकर उन्होंने आकाशवाणी चौक पर अपने काफिले को रुकवाया और आम लोगों से सीधे रूबरू हुईं। यह दृश्य असाधारण था—जहां एक ओर मंच पर ताली पर पाबंदी थी, वहीं सड़क पर जनता का अपनापन खुलकर बह रहा था। कई लोग इसे अब तक के राष्ट्रपति कार्यक्रमों के इतिहास की दुर्लभ घटना बता रहे हैं।
राष्ट्रपति का झारखंड और जमशेदपुर से पुराना जुड़ाव किसी से छिपा नहीं है। शायद यही वजह है कि उनकी नाराज़गी और जनता के बीच जाकर खड़ा होना, दोनों ही संदेश दे गए। कहा जाता है कि सम्मान आदेश से नहीं, भावना से मिलता है। और वही भावना जनता ने दिखाया। लेकिन सवाल अब भी खड़ा है कि क्या एनआईटी जमशेदपुर इस घटना से सबक लेगा, या प्रोटोकॉल के बोझ तले एक और दाग अपने इतिहास में दर्ज कर लेगा।

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