रक्षाबंधन: रक्षा और विश्वास की अनूठी डोर, सदियों से जोड़ रहा है रिश्तों का संसार

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डेस्क :- श्रावण मास की पूर्णिमा… कलाई पर रंग-बिरंगी राखियां… मिठाई की मिठास और आंखों में छलकता स्नेह। जी हां, आज रक्षाबंधन है – वह पर्व जो सिर्फ धागा नहीं, बल्कि सुरक्षा, विश्वास और प्रेम का अटूट वचन है।

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रक्षाबंधन का इतिहास उतना ही गहरा है जितना इसका भाव। पुराणों के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध हो रहा था, तब इंद्राणी ने इंद्रदेव की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी विजय की प्रार्थना की। महाभारत में द्रौपदी द्वारा श्रीकृष्ण की उंगली पर साड़ी का टुकड़ा बांधने की कथा भी इस पर्व की अमर मिसाल है, जब श्रीकृष्ण ने जीवनभर उसकी रक्षा का प्रण लिया।

मध्यकाल में यह धागा सिर्फ रिश्तों तक सीमित नहीं रहा। राजपूत रानियां पड़ोसी राजाओं को राखी भेजकर उनसे अपनी सुरक्षा का वचन लेती थीं। रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ की कहानी आज भी भाईचारे की मिसाल मानी जाती है।

आज का रक्षाबंधन बदल चुका है, लेकिन इसका मर्म वही है। बहन भाई की लंबी उम्र और खुशहाली की कामना करती है, और भाई उसकी हर परिस्थिति में रक्षा का संकल्प लेता है। यही नहीं, आधुनिक दौर में बहनें सेना, पुलिस और समाज के रक्षकों को भी राखी बांधकर ‘सुरक्षा की डोर’ में जोड़ रही हैं। रक्षाबंधन का यह त्यौहार हमें याद दिलाता है कि रिश्ते खून से नहीं, भरोसे से बनते हैं। एक छोटा सा धागा, जो कलाई पर बंधते ही दिलों को बांध देता है… यही है रक्षाबंधन का असली जादू।

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