कविता:- आज की नारी! – अल्पा पारिख
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मैं हूं मां
मैं ही अन्नुपूर्णा
और कोई अस्तित्व है मेरे भी
मैं हूं आज की नारी
मैं करूं संघर्ष
और बनु आदर्श
करके बातें प्यारी प्यारी
मैं हूं आज की नारी
मानो बात सब की बारी बारी
पर मैं ना अबला बेचारी
ना में किसी से ना हारी
मैं हूं आज की नारी
जो चाहा वो पाया
हर बार दिल को समझाया
पहेनो चाहे स्कर्ट, कुर्ता या साड़ी
मैं हूं आज की नारी
मैं ही प्यार
मुझसे ही परिवार
बनी सब की दुलारी
मैं हूं आज की नारी
मेरे है कितने स्वरूप
स्वीकार करो मेरा हर रूप
मनो देवी हूँ मैं या हूँ महा काली
मैं हूं आज की नारी
मुझमें है शक्ति
मुझमें है भक्ति
और चाहो तो में पढ़ो सब पर भारी
मैं हूं आज की नारी।
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