151वें सृजन संवाद में “युद्ध के विरुद्ध कविता” विषय पर हुआ विमर्श, कवियों की आवाज़ में गूंजा शांति का संदेश

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जमशेदपुर। साहित्य, कला और समसामयिक मुद्दों पर निरंतर चर्चा करने वाली संस्था ‘सृजन संवाद’ ने अपने 151वें संवाद में “युद्ध के विरुद्ध: कविता” विषय पर एक महत्वपूर्ण गोष्ठी का आयोजन किया। यह आयोजन ऑनलाइन मंचों जैसे स्ट्रीमयार्ड और फेसबुक लाइव के माध्यम से संपन्न हुआ, जिसमें देशभर से जाने-माने कवि, लेखक, शिक्षाविद और दर्शक जुड़े।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जब कई हिस्सों में युद्ध और संघर्ष की स्थितियां बनी हुई हैं, तब साहित्य जगत की यह पहल विशेष रूप से प्रासंगिक रही। गोष्ठी का उद्देश्य था – युद्ध की भयावहता, मानवीय पीड़ा और उसके विरुद्ध उठते कवि-स्वर को मंच देना।

कार्यक्रम का संचालन कवि परमानंद ने किया, जिन्होंने अपनी कविता ‘अबूझ माड़’ के साथ समकालीन कवियों की रचनाएं भी प्रस्तुत कीं। उनका कहना था कि जब तक मनुष्य की इच्छाएं आक्रामक रहेंगी, युद्ध की संभावनाएं बनी रहेंगी। डॉ. आभा विश्वकर्मा ने युद्ध विषयक कविताओं के माध्यम से यह दर्शाया कि युद्ध सिर्फ सीमाओं पर नहीं, इंसान के भीतर भी लड़ा जाता है।

इस आयोजन में विभिन्न भाषाओं में रची गईं कविताओं का पाठ हुआ — जिनमें इज़राइली, अंग्रेज़ी, हिंदी, मैथिली और संस्कृत कविताएं शामिल थीं। डॉ. अंशु तिवारी ने युद्ध के मैदान में शहीद हुए सैनिकों को समर्पित अंग्रेजी कविता का अनुवाद प्रस्तुत किया, वहीं मैसूर से जुड़ी दीपा मिश्रा ने मैथिली में अपनी रचनाएं सुनाकर युद्ध के दर्द को स्थानीय संवेदना में ढाल दिया।

वरिष्ठ संपादक डॉ. क्षमा त्रिपाठी ने भारतीय कवियों की रचनाओं के माध्यम से युद्ध की क्रूरता के खिलाफ साहित्य की भूमिका को रेखांकित किया। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि साहित्य न केवल मन की बात कहने का माध्यम है, बल्कि यह समाज को शांति और सह-अस्तित्व की ओर भी ले जाता है।

संस्था की संस्थापिका डॉ. विजय शर्मा ने अपने समापन वक्तव्य में कहा कि जैसे युद्ध का इतिहास पुराना है, वैसे ही साहित्य की भी भूमिका शांति बनाए रखने में अनंत रही है। उन्होंने आगामी संवाद में ‘युद्ध के विरुद्ध सिनेमा’ विषय पर परिचर्चा की घोषणा की और सभी सहभागियों को धन्यवाद दिया।

यह संवाद एक बार फिर इस बात की पुष्टि करता है कि जब दुनिया युद्ध की बात करती है, तो साहित्य शांति की पुकार करता है — और यही मानवता की सबसे बड़ी ताकत है ।

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