लालू परिवार में पोते के नामकरण ने भरी रिश्तों में मिठास?

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पटना:-  बिहार की सियासत में हमेशा सुर्खियों में रहने वाला लालू प्रसाद यादव का परिवार एक बार फिर चर्चा में है। इस बार कारण है परिवार में आपसी खींचतान और उसी के बीच जन्मे पोते का नामकरण समारोह। एक ओर जहां पारिवारिक तनाव की खबरें लगातार सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी ओर लालू परिवार ने इस बीच पोते के नामकरण का आयोजन कर एक नया संदेश देने की कोशिश की है।

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तेजस्वी बनाम तेज प्रताप की तकरार की पृष्ठभूमि में आयोजन

आरजेडी प्रमुख लालू यादव के दोनों बेटे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव के बीच संबंधों में लंबे समय से तनातनी की खबरें सामने आती रही हैं। पार्टी के अंदर नेतृत्व को लेकर मतभेद और निजी जीवन की कहानियों ने परिवार को कई बार विवादों में डाला है। ऐसे में जब तेजस्वी यादव के घर पुत्र जन्म के बाद नामकरण समारोह की खबर आई, तो सबकी नजर इस पर टिक गई कि इसमें कौन-कौन शामिल होगा।

नामकरण में सीमित उपस्थिति, लेकिन भावनात्मक माहौल

सूत्रों के अनुसार, नामकरण का आयोजन बेहद सादगीपूर्ण तरीके से हुआ। लालू यादव और राबड़ी देवी ने पारिवारिक पंडित की उपस्थिति में परंपरागत विधि से अपने पोते का नाम रखा। हालांकि समारोह में तेज प्रताप यादव की मौजूदगी को लेकर अटकलें बनी रहीं। कुछ स्थानीय नेताओं और परिवार के करीबी सदस्यों ने ही आयोजन में भाग लिया।

राजनीतिक संदेश देने की कोशिश?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह नामकरण सिर्फ पारिवारिक आयोजन नहीं, बल्कि एक तरह से सार्वजनिक संदेश भी है कि परिवार अब मतभेदों को पीछे छोड़कर एकजुट होने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, तेज प्रताप की ओर से कोई बयान सामने नहीं आया, जिससे अटकलों को और हवा मिल रही है।

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सोशल मीडिया पर चर्चा गर्म

इस समारोह की खबर फैलते ही सोशल मीडिया पर भी हलचल तेज हो गई। समर्थकों ने जहां परिवार को बधाइयां दीं, वहीं विरोधियों ने इसे “सियासी ड्रामा” बताया। आरजेडी समर्थकों ने इसे “नई पीढ़ी का स्वागत” कहा, जबकि आलोचकों ने इसे पारिवारिक कलेश से ध्यान भटकाने की कोशिश करार दिया।

लालू परिवार के भीतर के रिश्तों में तनाव की खबरों के बीच पोते के नामकरण का आयोजन एक सुखद पल जरूर लेकर आया, लेकिन इसके सियासी मायने भी कम नहीं हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह आयोजन परिवार को एकजुट करने की दिशा में कोई नया अध्याय लिखता है या फिर यह भी महज एक रस्मी औपचारिकता बनकर रह जाता है।

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