तेजस्वी पर हमलावर, लेकिन लालू पर मौन क्यों? प्रशांत किशोर की रणनीति पर उठने लगे सवाल


बिहार :- बिहार की राजनीति में बयानबाज़ी के मैदान में तेजस्वी यादव को लगातार घेरने वाले जनसुराज अभियान के नेता प्रशांत किशोर अब खुद सवालों के घेरे में आ गए हैं। वजह साफ है – वे तेजस्वी यादव को हर मंच से घेरते हैं, लेकिन लालू प्रसाद यादव पर कोई सीधी टिप्पणी नहीं करते।

जहां एक ओर पीके लगातार तेजस्वी को “पापा के भरोसे राजनीति में टिके नेता”, “विफल युवा चेहरा” और “जनता को धोखा देने वाला” करार देते हैं, वहीं चारा घोटाले के दोषी और राजद के संस्थापक लालू यादव के शासनकाल की चर्चा करते हुए वे बेहद संयमित दिखाई देते हैं।
तो आखिर क्यों इस सधे हुए चुप्पी का सहारा ले रहे हैं पीके?
क्या यह उनके रणनीतिक दिमाग की बिसात है या फिर लालू प्रसाद यादव की लोकप्रियता का डर?
विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर जानते हैं कि लालू यादव आज भी बिहार की राजनीति में एक भावनात्मक चेहरा हैं। विशेषकर यादव-मुस्लिम मतदाताओं के बीच उनका गहरा प्रभाव है। ऐसे में लालू यादव पर सीधा हमला पीके के लिए राजनीतिक जोखिम बन सकता है।
दूसरी ओर, तेजस्वी यादव को कमजोर दिखाना और उन्हें वंशवाद की उपज करार देना पीके की रणनीति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। इससे वे यह संदेश देना चाहते हैं कि बिहार में एक नया विकल्प चाहिए – न वंशवाद, न सांप्रदायिकता, बल्कि विकास और जन भागीदारी की राजनीति।
लेकिन पीके की यह दोहरी रणनीति अब जनता की नजरों से छुप नहीं रही है।
आम लोगों के बीच यह चर्चा अब आम होती जा रही है कि क्या प्रशांत किशोर भी राजनीतिक लाभ के लिए ‘सिलेक्टिव हमला’ करने लगे हैं? क्या वे भी उस चुप्पी की राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं, जिसे लेकर वे खुद अन्य दलों पर सवाल उठाते रहे हैं?
राजद खेमे से अब तक पीके के बयानों पर कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन अंदरूनी सूत्रों की मानें तो लालू यादव की चुप्पी भी सोच-समझकर रखी गई है। माना जा रहा है कि राजद फिलहाल पीके को गंभीर चुनौती नहीं मानता, लेकिन लगातार मिल रही जन समर्थन और भीड़ को देखकर उनकी रणनीति बदल भी सकती है।
फिलहाल, बिहार की सियासत में यह सवाल तेज़ी से तैर रहा है — “तेजस्वी पर प्रहार, लेकिन लालू पर तटस्थता — क्या यही है प्रशांत किशोर का नया ‘जनसुराज’?”



