झारखंड के नायक गुरूजी शिबू सोरेन को पद्म भूषण से मिलेगा सम्मान,

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झारखंड: झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके शिबू सोरेन को आदिवासियों का बहुत बड़ा नेता माना जाता है। वह दिशोम गुरु के नाम से भी जाने जाते हैं। उनका जन्म 11 जनवरी 1944 को तत्कालीन बिहार राज्य के रामगढ़ जिला के नेमरा गांव में हुआ था। वह संथाल जनजाति से थे। स्कूली शिक्षा के दौरान उनके पिता की हत्या कर दी गई थी।

18 साल की उम्र में उन्होंने संथाल नवयुवक संघ का गठन किया। 1972 में बंगाली मार्क्सवादी ट्रेड यूनियन नेता एके रॉय, बिनोद बिहारी महतो और शिबू सोरेन ने मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया। सोरेन झामुमो के महासचिव बने। झामुमो ने जनजातीय भूमि को वापस पाने के लिए आंदोलन किए।शिबू सोरेन और उनके समर्थक तीर-धनुष के साथ चलते थे। उन्होंने ‘धान काटो आंदोलन’ का नेतृत्व किया, जिसमें आदिवासी महिलाएं खेतों में उतरतीं और पुरुष पहरा देते थे। इस संघर्ष के कारण वे प्रशासन के लिए चुनौती बन गए। कई मामलों में उन्हें जेल जाना पड़ा और कई बार अंडरग्राउंड भी रहना पड़ा। उन्होंने पारसनाथ की पहाड़ियों और टुंडी के जंगलों में समय बिताया, लेकिन उनका जनाधार लगातार बढ़ता गया। इसी दौर में उन्होंने ‘सोनोत संताल’ संगठन की स्थापना की और आदिवासी चेतना को संगठित स्वर दिया। संताली समाज ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि दी, जिसका अर्थ है ‘देश का नेता’। 4 फरवरी 1972 को धनबाद में ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ (जेएमएम) की स्थापना हुई। यह संगठन शिबू सोरेन के ‘सोनोत संताल’ और विनोद बिहारी महतो के ‘शिवाजी समाज’ के विलय से बना। शिबू सोरेन महासचिव बने और विनोद बिहारी महतो अध्यक्ष। जेएमएम ने शीघ्र ही झारखंड, ओडिशा और बंगाल के आदिवासी इलाकों में मजबूत आधार बना लिया। शिबू सोरेन 1980 में पहली बार दुमका से सांसद चुने गए। 1991 में विनोद बिहारी महतो के निधन के बाद वे जेएमएम के केंद्रीय अध्यक्ष बने और पार्टी के पर्याय बन गए। उनके नेतृत्व में अलग झारखंड राज्य आंदोलन निर्णायक मोड़ पर पहुंचा और वर्ष 2000 में झारखंड राज्य का गठन हुआ। वे 2005, 2008 और 2009 में तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने और दो बार केंद्रीय मंत्री भी रहे।

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