महाशिवरात्रि का पूजन ” निशीथ काल ” में करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है : पंडित हरिशरण दुबे

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बिक्रमगंज /रोहतास (संवाददाता ):– निशीथ काल पूजा मुहूर्त : 24:06:41 से 24:55:14 तक,अवधि : 0 घंटे 48 मिनट,महाशिवरात्री पारणा मुहूर्त : 06:36:06 से 15:04:32 तक 12 मार्च को महाशिवरात्रि पर्व हिन्दुओं के सबसे बड़े पर्वों में से एक है । दक्षिण भारतीय पंचांग (अमावस्यान्त पंचांग) के अनुसार माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को यह पर्व मनाया जाता है । वहीं उत्तर भारतीय पंचांग (पूर्णिमान्त पंचांग) के मुताबिक फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का आयोजन होता है । पूर्णिमान्त व अमावस्यान्त दोनों ही पंचांगों के अनुसार महाशिवरात्रि एक ही दिन पड़ती है । इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से पर्व की तारीख वही रहती है । इस दिन शिव-भक्त मंदिरों में शिवलिंग पर बेल्व -पत्र आदि चढ़ाकर पूजा, व्रत तथा रात्रि-जागरण करते हैं ।

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महाशिवरात्रि व्रत का शास्त्रोक्त नियम :
1.चतुर्दशी पहले ही दिन निशीथव्यापिनी हो, तो उसी दिन महाशिवरात्रि मनाते हैं। रात्रि का आठवां मुहूर्त निशीथ काल कहलाता है । सरल शब्दों में कहें तो जब चतुर्दशी तिथि शुरू हो और रात का आठवां मुहूर्त चतुर्दशी तिथि में ही पड़ रहा हो, तो उसी दिन शिवरात्रि मनानी चाहिए ।
2.चतुर्दशी दूसरे दिन निशीथकाल के पहले हिस्से को छुए और पहले दिन पूरे निशीथ को व्याप्त करे, तो पहले दिन ही महाशिवरात्रि का आयोजन किया जाता है ।
3.उपर्युक्त दो स्थितियों को छोड़कर बाकी हर स्थिति में व्रत अगले दिन ही किया जाता है ।

शिवरात्रि व्रत की पूजा-विधि :

1. मिट्टी के लोटे में पानी या दूध भरकर ऊपर से बेल्वपत्र, आक-धतूरे के फूल, चावल आदि डालकर ‘शिवलिंग’ पर चढ़ाना चाहिए । अगर आस-पास कोई शिव मंदिर नहीं है, तो घर में ही मिट्टी का शिवलिंग बनाकर उनका पूजन किया जाना चाहिए ।
2. शिव पुराण का पाठ और महामृत्युंजय मंत्र या शिव के पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय का जाप इस दिन करना चाहिए। साथ ही महाशिवरात्री के दिन रात्रि जागरण का भी विधान है ।
3. शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार शिवरात्रि का पूजन ‘निशीथ काल’ में करना सर्वश्रेष्ठ रहता है। हालांकि भक्त रात्रि के चारों प्रहरों में से अपनी सुविधानुसार यह पूजन कर सकते हैं ।

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ज्योतिष के दृष्टिकोण से शिवरात्रि पर्व :
चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ अर्थात स्वयं शिव ही हैं। इसलिए प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि के तौर पर मनाया जाता है। ज्योतिष शास्त्रों में इस तिथि को अत्यंत शुभ बताया गया है । गणित ज्योतिष के आंकलन के हिसाब से महाशिवरात्रि के समय सूर्य उत्तरायण हो चुके होते हैं और ऋतु-परिवर्तन भी चल रहा होता है । ज्योतिष के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी कमजोर स्थिति में आ जाते हैं। चन्द्रमा को शिव जी ने मस्तक पर धारण किया हुआ है — अतः शिवजी के पूजन से व्यक्ति का चंद्र सबल होता है, जो मन का कारक है । दूसरे शब्दों में कहें तो शिव की आराधना इच्छा-शक्ति को मजबूत करती है और अन्तःकरण में अदम्य साहस व दृढ़ता का संचार करती है ।

महाशिवरात्रि पर्व की पौराणिक कथा :

पंडित हरिशरण दुबे ने कहा कि शिवरात्रि पर्व को लेकर बहुत सारी कथाएं प्रचलित हैं । विवरण मिलता है कि भगवती पार्वती ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए घनघोर तपस्या की थी । पौराणिक कथाओं के अनुसार इसके फलस्वरूप फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था । यही कारण है कि महाशिवरात्रि को अत्यन्त महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाता है । वहीं गरुड़ पुराण में इस दिन के महत्व को लेकर एक अन्य कथा कही गई है । जिसके अनुसार इस दिन एक निषादराज अपने कुत्ते के साथ शिकार खेलने गया किन्तु उसे कोई शिकार नहीं मिला । वह थककर भूख-प्यास से परेशान हो एक तालाब के किनारे गया, जहां बेल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था । अपने शरीर को आराम देने के लिए उसने कुछ बेल्व-पत्र तोड़े, जो शिवलिंग पर भी गिर गए । अपने पैरों को साफ करने के लिए उसने उनपर तालाब का जल छिड़का, जिसकी कुछ बून्दें शिवलिंग पर भी जा गिरीं । ऐसा करते समय उसका एक तीर नीचे गिर गया । जिसे उठाने के लिए वह शिव लिंग के सामने नीचे को झुका । इस तरह शिवरात्रि के दिन शिव-पूजन की पूरी प्रक्रिया उसने अनजाने में ही पूरी कर ली । मृत्यु के बाद जब यमदूत उसे लेने आए, तो शिव के गणों ने उसकी रक्षा की और उन्हें भगा दिया ।जब अज्ञानतावश महाशिवरात्रि के दिन भगवान शंकर की पूजा का इतना अद्भुत फल होता है ।

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