बिहार चुनावों में महागठबंधन को क्यों करना पड़ा बड़ी हार का सामना


बिहार:बिहार की विधानसभा चुनावों में अभी तक की गिनती के रुझानों ने एक मजबूत संदेश दिया है। जदयू-भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए महागठबंधन को बड़े अंतर से मात देती दिख रही है। शुरुआती दौर में ही एनएडी ने आकंड़ों में स्पष्ट बढ़त बना ली है। इससे विपक्षी गठबंधन की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। 12 बजे तक के रुझानों में एनडीए 189 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। वहीं, राजद की अगुवाई में महागठबंधन के प्रत्याशी केवल 50 सीटों पर ही आगे चल रहे हैं। अन्य उम्मीदवार तीन सीटों पर आगे हैं। बिहार चुनाव नतीजों के रुझानों में सबसे अधिक चौंकाया है जनसुराज ने। प्रशांत किशोर की पार्टी के उम्मीदवार किसी भी सीट पर बढ़त नहीं बना सके हैं.महागठबंधन की हार के छह बड़े कारण.तेजस्वी ने हर घर सरकारी नौकरी, पेंशन, महिला सशक्तिकरण जैसे बड़े वादे किए, लेकिन फंडिंग और टाइमलाइन का ठोस प्लान जनता से साझा नहीं किया। ऐसे में ये दावे लोगों को हकीकत से अधिक हवा-हवाई लगने लगे। महागठबंधन के नेता बार-बार कहते रहे कि ब्लूप्रिंट आएगा, लेकिन चुनाव खत्म होने तक नहीं आ पाया। इससे राजद और महागठबंधन के नेताओं की विश्वसनीयता जनता के नजर में कम हुई.महागठबंधन मुस्लिम बहुल सीटों पर तो मजबूत रहा, लेकिन पूरे प्रदेश में यह छवि नुकसानदेह साबित हुई। बीजेपी ने इसे भुनाया और यादव वोट भी कई जगहों पर आरजेडी से खिसक गए। वक्फ बिल पर तेजस्वी के बयान ने भी विवाद बढ़ाया। दूसरी ओर एनडीए ने पूरे चुनाव के दौरान लालूराज की याद दिलाकर जंगलराज को निशाना बनाया। आरजेडी उम्मीदवारों के मंच से दबंगई के अंदाज में ‘कट्टे वाला’ चुनाव प्रचार भी लोगों को पसंद नहीं आया.आरजेडी ने 144 सीटों में से 52 यादव उम्मीदवार उतारे, यानी करीब 36%। यह तेजस्वी की ‘यादव एकीकरण’ रणनीति थी, लेकिन इससे जातिवादी छवि और मजबूत हो गई। सहयागी पार्टी भी शुरुआती दौर में इस फैसले से असहमत दिखे। गैर-यादव वोट बैंक-अगड़े और अति पिछड़े- महागठबंधन से दूर हो गए। बीजेपी ने इसे ‘यादव राज’ का नैरेटिव बनाकर शहरी और मध्यम वर्ग के बीच इसे खूब भुनाया।चुनाव में महागठबंधन खेमे में राजद ही राजद दिखा। राजद ने चुनाव प्रचार को स्वयंभू अंदाज में आगे बढ़ाया। कांग्रेस और वाम दलों को अंदरखाने शिकायत रही की राजद और उनके बीच भरोसे की कमी रही। राजद का कांग्रेस और वाम दलों के साथ हुआ सीट शेयरिंग विवाद भी महागठबंधन को भारी पड़ गया। इस विवाद ने गठबंधन को कमजोर किया। तेजस्वी यादव उस भरोसे को हसिल करने में असफल रहे जो वोटरों को अपने पक्ष में कर सकता था। एनडीए ने सीट शेयरिंग और प्रचार में एकजुटता दिखाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों ने एनडीए को मजबूत नैरेटिव दिया। महागठबंधन की अंदरूनी खींचतान के मुकाबले एनडीए का चुनावी प्रबंधन बहुत हद तक प्रभावी रहा और पूरे बिहार में वोटरों ने मोदी-नीतीश की जोड़ी पर भरोसा जताया। चुनावी समर के बीच में भाजपा के बड़े नेताओं ने भी अपरोक्ष रूप से साफ कर दिया कि सीएम नीतीश ही होगे। तेजस्वी ने लालू की विरासत को अपनाया, लेकिन पोस्टर्स में उनकी तस्वीर छोटी कर ‘नई पीढ़ी’ का संदेश देने की कोशिश की। यह दोहरी नीति उलटी पड़ गई.




