झारखंड की आत्मा ने विदा ली: शिबू सोरेन अब नहीं रहे


रांची / दिल्ली :- झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक शिबू सोरेन का सोमवार सुबह नई दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में 81 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे बीते एक महीने से किडनी संबंधित गंभीर बीमारी से पीड़ित थे और वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे। सोमवार सुबह 8:56 बजे उन्हें मृत घोषित किया गया। उनके निधन की खबर से पूरे झारखंड में शोक की लहर दौड़ गई है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भावुक श्रद्धांजलि देते हुए कहा, “आज मैं शून्य हो गया हूँ, आदरणीय दिशोम गुरुजी अब हमारे बीच नहीं रहे।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत तमाम नेताओं ने शोक व्यक्त करते हुए उन्हें आदिवासी समाज के लिए संघर्षशील और समर्पित नेता बताया। शिबू सोरेन का जीवन संघर्ष, आंदोलन और राजनीतिक नेतृत्व की मिसाल रहा है। उनका जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड के रामगढ़ गांव में एक संथाल आदिवासी परिवार में हुआ था। वे 1960 के दशक से ही आदिवासियों के हक और अधिकार के लिए आंदोलन में सक्रिय हो गए थे। 1972 में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की और झारखंड अलग राज्य की मांग को लेकर एक लंबा जनांदोलन खड़ा किया। 1980 में वे पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए और इसके बाद कई बार संसद पहुंचे। 2004 में वे केंद्र सरकार में कोयला मंत्री बनाए गए लेकिन एक पुराने आपराधिक मामले के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। हालाँकि बाद में उन्हें इस मामले में बरी कर दिया गया। शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। पहली बार 2005 में उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के कारण मात्र 10 दिनों में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। दूसरी बार 2008 में उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला लेकिन सहयोगी दलों से मतभेद के चलते यह कार्यकाल भी 5 महीने में समाप्त हो गया। तीसरी बार 2009 में उन्होंने मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली और 2010 तक पद पर बने रहे। वे झारखंड के पहले ऐसे आदिवासी नेता थे, जिन्होंने राज्य के सबसे ऊंचे पद पर रहकर आदिवासी समाज के हक में फैसले लिए। उनकी पहचान एक जमीनी नेता और आदिवासी चेतना के प्रतीक के रूप में रही है। उन्हें ‘दिशोम गुरु’ यानी आदिवासियों का नेता कहा जाता था। उन्होंने भूमि अधिग्रहण, खनिज संपदा पर स्थानीय अधिकार और भाषा-संस्कृति की रक्षा जैसे मुद्दों पर आवाज़ बुलंद की। उनका राजनीतिक जीवन संघर्षों से भरा रहा लेकिन उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। अप्रैल 2025 में उन्होंने झामुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर अपने पुत्र हेमंत सोरेन को यह जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके बाद से वे राजनीति से धीरे-धीरे दूर होते चले गए। उनके निधन को झारखंड की राजनीति में एक युग का अंत माना जा रहा है। झारखंड सरकार ने उनके सम्मान में दो दिन का राजकीय शोक घोषित किया है और राज्य के सभी सरकारी कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और भवनों में राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा। उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ उनके पैतृक गांव में किया जाएगा। हजारों कार्यकर्ता, समर्थक और आमजन उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंच रहे हैं। शिबू सोरेन की विरासत अब हेमंत सोरेन के कंधों पर है और झारखंड की राजनीति में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।




