पत्रकार ने किया शोषण, वकील ने किया सौदा… न्याय के चौखट पर टूटी उम्मीदें, कोर्ट परिसर में फूटा महिला का गुस्सा! वकील से हुई झड़प…

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जमशेदपुर /सरायकेला :- जब इंसाफ की उम्मीद लिए एक महिला अदालत की सीढ़ियां चढ़ती है, तो वो सबसे पहले उस इंसान पर भरोसा करती है, जो उसकी लड़ाई को कानूनी शक्ल देने का वादा करता है — वकील। लेकिन जब वही वकील आरोपी का पक्ष लेने लगे, जानकारी छिपाने लगे और पीड़िता को अंधेरे में रखने लगे, तो फिर भरोसे की नींव दरक जाती है… और इंसाफ की छत भी ढहने लगती है।

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ताजा मामला झारखंड के सरायकेला जिला कोर्ट का है, जहां एक महिला पीड़िता न्याय की गुहार लेकर अपने वकील से ही भिड़ गई। महिला का आरोप है कि आदित्यपुर के एक पत्रकार ने उसके साथ यौन शोषण किया और इस शर्मनाक कृत्य में कई स्थानीय रसूखदार लोग भी शामिल हैं। वह लगभग डेढ़ साल से ज्यादा समय से न्याय के लिए दर-दर भटक रही है लेकिन हर बार उसे सिर्फ तारीखें और झूठे दिलासे ही नसीब हुए।

सबसे गंभीर आरोप वकील अशोक दास पर लगे हैं। पीड़िता का कहना है कि उन्होंने केस की गंभीर जानकारियाँ उससे छिपाईं और बलात्कार के आरोपी पत्रकार को बचाने की कोशिश की। इसके चलते न सिर्फ महिला, बल्कि उसका पूरा परिवार मानसिक रूप से टूट चुका है।

जब इसपर वकील अशोक दास से सवाल किए गए तो उन्होंने कहा कि मामला रंगदारी और बलात्कार जैसे गंभीर धाराओं में दर्ज है और फिलहाल कोर्ट के आदेश का इंतज़ार किया जा रहा है। उनका कहना है कि केस अप्रैल 2025 में दर्ज हुआ, जबकि महिला का दावा है कि यह जनवरी 2024 से ही चल रहा है। दोनों की तारीखों में विरोधाभास और तथ्यों में अंतर गंभीर संकेत देते हैं।

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इसी कड़ी में सरायकेला जिला बार एसोसिएशन पूर्व उपाध्यक्ष ओम प्रकाश ने बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि अशोक दास सरायकेला बार एसोसिएशन के सदस्य ही नहीं हैं। उन्होंने भी स्वीकारा कि जब कोई पीड़ित व्यक्ति किसी वकील के पास आता है, तो उसका पहला अधिकार है कि उसे न्याय समय पर मिले। वकील की जिम्मेदारी सिर्फ केस लड़ना नहीं, बल्कि सच के साथ खड़ा होना भी है।

अब सवाल यह है कि जब न्याय दिलाने वाला ही न्याय की राह रोकने लगे, तो पीड़ित किस दरवाज़े पर जाए? जब अदालतें तारीख़ों के जाल में उलझ जाएँ और आरोपी खुलेआम घूमते रहें, तो कानून पर से भरोसा कैसे कायम रहेगा?

इस मामले ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। क्या अब इस महिला को न्याय मिलेगा? या फिर ये मामला भी फाइलों के बोझ तले दब जाएगा?

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