रूस में हथियार बनाने वाली कंपनियों की रेयर मीटिंग.

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नई दिल्ली: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का इस साल का भारत दौरा बेहद खास रहा है। इसकी परतें अब खुलने लगी हैं। दरअसल, जब भारत में पुतिन के आने की तैयारी हो रही थी और उस सिलसिले में भारतीय अधिकारी मास्को गए हुए थे, उसी दौरान भारत की हथियार बनाने वाली बड़ी कंपनियों के अधिकारी भी रूस में कैंप कर रहे थे। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हथियार बनाने वाली बड़ी कंपनियों के करीब आधा दर्जन अधिकारियों ने इसी समय रूसी आर्म्स कंपनियों के साथ ज्वाइंट वेंचर को लेकर बड़ी बैठक में जुटे हुए थे।यह दौरा असल में दिसंबर में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा की तैयारी का हिस्सा था. युद्ध के बाद यह पहला मौका था जब भारत के इतने बड़े डिफेंस इंडस्ट्री लीडर्स रूस गए.मीटिंग में क्या चर्चा हुई-सूत्रों के मुताबिक, बातचीत का फोकस तीन बड़ी चीजों पर था-MiG-29 फाइटर जेट और अन्य रूसी हथियारों के लिए भारत में स्पेयर पार्ट्स बनाना,रूस का प्रस्ताव कि भारत के भीतर उनके टेक्नोलॉजी वाले प्रोडक्शन यूनिट सेटअप हों. कुछ ऐसी इकाइयाँ बनाना जिनसे बना उपकरण रूस को ही निर्यात किया जा सके.भारत लंबे समय से रूसी हथियारों पर निर्भर रहा है. आज भी भारतीय सेना के लगभग 36% हथियार रूसी मूल के हैं.ऐसे में भारत चाहता है कि पुराने मॉडल से आगे बढ़कर जॉइंट रिसर्च, डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन को नई दिशा दी जाए ताकि देश आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण में तेजी ला सके.सूत्र बताते हैं कि इस मीटिंग में सिर्फ बड़ी कंपनियां ही नहीं, बल्कि डिफेंस स्टार्टअप्स, ड्रोन टेक्नोलॉजी कंपनियों और AI-आधारित सैन्य सिस्टम बनाने वाले प्रतिनिधि भी शामिल थे.दो सूत्रों के मुताबिक-Bharat Forge (Kalyani Group) का एक वरिष्ठ अधिकारी वहां मौजूद था. उनका फोकस था-
-रूसी टैंकों और एयरक्राफ्ट के पार्ट्स का जॉइंट डेवलपमेंट
-भविष्य में हेलिकॉप्टर प्रोग्राम में सहयोग की संभावनाएं
-Adani Defence की ओर से CEO आशीष राजवंशी के मौजूद रहने की बात कही गई है.इसके अलावा, Society of Indian Defence Manufacturers (SIDM) का एक प्रतिनिधि भी शामिल था, जिसके साथ 500 से अधिक डिफेंस कंपनियां जुड़ी हैं.भारत के लिए रिस्क भी हैपश्चिमी देश साफ कह चुके हैं कि भारत की रूस से गहरी डिफेंस पार्टनरशिप उनके लिए एक “टेक्नोलॉजी ट्रांसफर रिस्क” है. यानी जितनी ज्यादा साझेदारी रूस से होगी, उतना कठिन होगा कि अमेरिका या यूरोप भारत को संवेदनशील हथियार टेक्नोलॉजी दें.

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इसके अलावा, भारतीय कंपनियां अब रूस से नए सौदे करते समय सेकेंडरी सैंक्शंस के खतरे को लेकर भी सतर्क हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच किसी भी गलत कदम पर पश्चिमी प्रतिबंधों का डर बना रहता है.

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