एनआईटी जमशेदपुर ने क्षेत्रीय शिक्षकों के लिए हाई-टेक शोध प्रशिक्षण के साथ तकनीकी पुनर्जागरण का किया शंखनाद

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जमशेदपुर: पूर्वी भारत में तकनीकी शिक्षा के परिदृश्य को एक नई दिशा देने के उद्देश्य से, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) जमशेदपुर में शोध पद्धतियों के आधुनिकीकरण पर केंद्रित दो दिवसीय गहन कार्यशाला रविवार शाम सफलतापूर्वक संपन्न हुई। 17 और 18 जनवरी, 2026 को आयोजित इस कार्यक्रम को विशेष रूप से पड़ोसी इंजीनियरिंग कॉलेजों के शिक्षकों को डिजिटल युग के अत्याधुनिक उपकरणों से लैस करने के लिए तैयार किया गया था। इसमें ‘जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) की बारीकियों से लेकर ‘एथिकल प्रोजेक्ट मैनेजमेंट’ की जटिलताओं तक पर व्यापक चर्चा की गई। मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग द्वारा विज्ञान और इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड (SERB-ANRF) की वैज्ञानिक सामाजिक उत्तरदायित्व नीति के तहत आयोजित यह कार्यक्रम, पारंपरिक शैक्षणिक प्रथाओं और वैश्विक उद्योगों में आ रहे तीव्र तकनीकी बदलावों के बीच की खाई को पाटने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ।
शनिवार को उद्घाटन सत्र के दौरान संस्थान के निदेशक प्रो. गौतम सूत्रधर ने अनुसंधान के भविष्य को लेकर एक दूरदर्शी दृष्टिकोण साझा किया। उनके साथ अनुसंधान एवं परामर्श के डीन प्रो. सतीश कुमार और विभागाध्यक्ष प्रो. परमानन्द कुमार भी उपस्थित रहे। इस अवसर पर प्रो. सूत्रधर ने “सामाजिक समाधानों” की आवश्यकता पर बल देते हुए एक ऐतिहासिक घोषणा की। उन्होंने कहा कि अब एनआईटी जमशेदपुर में होने वाले कुल पीएचडी शोध कार्यों का कम से कम पांच प्रतिशत हिस्सा अनिवार्य रूप से उद्योग या प्रत्यक्ष सामाजिक लाभ के लिए ‘टैंजिबल प्रोडक्ट्स’ (ठोस उत्पाद) विकसित करने पर केंद्रित होगा। नीतिगत स्तर पर यह बदलाव यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया है कि शैक्षणिक श्रम केवल प्रयोगशाला की फाइलों तक सीमित न रहे, बल्कि राष्ट्र की प्रगति और आर्थिक आत्मनिर्भरता में योगदान दे। कार्यशाला के समन्वयक डॉ. शशांक पांडेय और प्रो. संजय ने बताया कि देशभर से बड़ी संख्या में हुए पंजीकरण इस बात का प्रमाण हैं कि प्रतिस्पर्धी शैक्षणिक परिवेश में ‘टेक-फॉरवर्ड’ प्रशिक्षण की आज कितनी अधिक आवश्यकता है।
इस 16 घंटे के सघन प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य ढांचा आधुनिक शोध के पांच स्तंभों पर आधारित था। इसमें आईआईटी दिल्ली, आईआईटी गुवाहाटी, डीटीयू और बिट्स पिलानी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के दिग्गजों ने व्याख्यान दिए। चर्चा का मुख्य केंद्र ‘एआई क्रांति’ रही, जहां शिक्षकों को शोध के चक्र में ‘जेनरेटिव एआई’ के एकीकरण की जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बताया कि कैसे इन स्वचालित उपकरणों का उपयोग नैतिक रूप से डेटा विश्लेषण को सुव्यवस्थित करने और अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। डिजिटल प्रगति के साथ-साथ ‘भविष्य की सामग्रियों’ पर भी तकनीकी चर्चा हुई। आईआईटी दिल्ली के प्रो. एस. प्रद्युम्न ने ‘स्पेस-एज’ मैटेरियल्स जैसे फंक्शनली ग्रेडेड मैटेरियल्स और मेटल-ग्राफीन कंपोजिट्स पर सत्र लिए, जो आने वाले समय में एयरोस्पेस और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में क्रांति लाने के लिए तैयार हैं।
तकनीकी विशेषज्ञता के अलावा, कार्यशाला में आधुनिक विद्वत्ता के व्यावहारिक और नैतिक आयामों पर भी ध्यान केंद्रित किया गया। ‘अनुसंधान परियोजना प्रबंधन की कला’ पर विशेष सत्र आयोजित किए गए, जिसमें शिक्षकों को राष्ट्रीय अनुदान प्राप्त करने और बड़े पैमाने पर प्रायोजित परियोजनाओं को सटीकता से प्रबंधित करने का रोडमैप दिया गया। इसे शोध नैतिकता के साथ संतुलित किया गया, जहाँ डीटीयू के प्रो. नवीन कुमार ने “निष्ठा के साथ अनुसंधान के उत्साह को बनाए रखने” पर जोर दिया, जबकि एनआईटी पटना के प्रो. ओम प्रकाश ने नए जमाने की शोध पद्धतियों पर प्रकाश डाला। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि एआई के दौर में भले ही लेखन की सीमाएं धुंधली हो रही हों, लेकिन वैज्ञानिक प्रगति की आधारशिला मानवीय जवाबदेही और नैतिकता ही रहेगी।
रविवार शाम समापन सत्र के साथ जमशेदपुर क्षेत्र के लिए इस आयोजन के व्यापक मायने स्पष्ट हुए। छोटे क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए एक ‘नॉलेज हब’ के रूप में कार्य करते हुए, एनआईटी जमशेदपुर उत्कृष्टता के उस प्रवाह को बढ़ावा दे रहा है जिससे स्नातक स्तर के छात्रों तक नवीनतम वैश्विक पद्धतियां पहुंच सकेंगी। कार्यक्रम के अंत में शिक्षकों से आह्वान किया गया कि वे इन आधुनिक उपकरणों को केवल सुविधा नहीं, बल्कि समाज की बढ़ती तकनीकी मांगों को पूरा करने के लिए अनिवार्य माध्यम मानें। उम्मीद की जा रही है कि इन दो दिनों का प्रभाव आने वाले वर्षों में स्थानीय कक्षाओं में दिखेगा, जब ये शिक्षक अपने संस्थानों में लौटकर भारतीय इंजीनियरों की अगली पीढ़ी को नए जोश और दृष्टि के साथ तैयार करेंगे।

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