यूपी में राजपूत के बाद भाजपा के ब्राह्मण विधायकों की बैठक

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यूपी: यूपी की राजनीति में जाति के नाम पर वार-पलटवार का दौर तो हमेशा चलता रहता है। टिकट से लेकर पार्टियों में पद भी जाति के आधार पर देने की तो परंपरा ही है। ऐसे में जब किसी दल में एक जाति के विधायकों की गोलबंदी होती है तो माहौल गरमा जाता है। कुछ समय पहले लखनऊ में राजपूत विधायकों ने कुटुंब के नाम से बैठक की थी। अब भाजपा के ब्राह्मण विधायकों ने सहभोज के नाम पर बैठक की है। विधानमंडल के शीतकालीन सत्र के दौरान भाजपा के ब्राह्मण विधायकों के जुटान ने सूबे का सियासी माहौल गर्मा दिया है। कुशीनगर से भाजपा विधायक पीएन पाठक के बहुखंडी स्थित आवास पर ब्रह्माण विधायकों का जुटान हुआ है। इसमें करीब तीन दर्जन विधायक और विधान परिषद सदस्यों के शामिल होने की खबर है। सरकार और संगठन में बदलाव के इस दौर में लोग इस जुटान के सियासी मायने तलाशने में जुटे हैं। बैठक की कई तस्वीरें वायरल हो रही हैं। भाजपा ने भी इस पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं।भाजपा लंबे समय से सामाजिक संतुलन की राजनीति पर जोर देती रही है, लेकिन हाल के वर्षों में यह चर्चा तेज हुई है कि ब्राह्मण नेतृत्व अपेक्षाकृत हाशिए पर गया है। कुछ विधायक यह मानते हैं कि प्रशासनिक फैसलों, संगठनात्मक नियुक्तियों और सरकार में हिस्सेदारी के स्तर पर उनकी आवाज पर्याप्त रूप से नहीं सुनी जा रही।
इसी पृष्ठभूमि में लखनऊ की यह बैठक महज औपचारिक संवाद नहीं, बल्कि शक्ति-प्रदर्शन और सामूहिक दबाव की रणनीति के रूप में देखी जा रही है। अन्य दलों के ब्राह्मण विधायकों का संभावित जुड़ाव इस संकेत को और मजबूत करता है कि मामला केवल भाजपा के भीतर का नहीं, बल्कि व्यापक ब्राह्मण राजनीति की दिशा तय करने की कोशिश भी हो सकती है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि साझा मंच का विचार तीन स्तरों पर काम कर सकता है—
दबाव की राजनीति: सरकार और पार्टी नेतृत्व पर यह दबाव बनाना कि नीतिगत और संगठनात्मक फैसलों में ब्राह्मण समाज की अनदेखी न हो।
सामूहिक सौदेबाजी: चुनावी समीकरणों से पहले एक संगठित आवाज बनाकर राजनीतिक दलों से बेहतर हिस्सेदारी सुनिश्चित करना।
भविष्य का संकेत: यदि मांगें नहीं मानी गईं तो यह मंच भविष्य में अलग राजनीतिक लाइन या वैकल्पिक रणनीति का आधार भी बन सकता है।
यह पूरी गतिविधि भाजपा के लिए चेतावनी की घंटी मानी जा रही है। यूपी की राजनीति में ब्राह्मण मतदाता और नेतृत्व ऐतिहासिक रूप से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। ऐसे में यदि असंतोष की यह धारा संगठित रूप लेती है, तो उसका असर आने वाले चुनावों और राजनीतिक संतुलन पर पड़ सकता है।
फिलहाल भाजपा नेतृत्व इस बैठक को “आंतरिक संवाद” बताकर महत्व कम आंकने की कोशिश कर सकता है, लेकिन सियासी जानकार मानते हैं कि इस तरह की एकजुटता को हल्के में लेना रणनीतिक भूल साबित हो सकती है।कुल मिलाकर, लखनऊ में चल रही यह बैठक केवल एक जातीय समूह की बैठक नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की बदलती सियासत में नए समीकरणों की आहट है—जिसका असर आने वाले दिनों में और साफ दिखाई दे सकता है।

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