राजद-भाकपा माले के नए समीकरण से गरमाई बिहार की सियासत

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पटना :- बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नया रंग घुल रहा है — ‘लाल’ और ‘हरा’ का गठबंधन, यानी भाकपा माले और राजद का मिलन। लाल झंडे की क्रांति और हरे परचम की सामाजिक न्याय वाली राजनीति अब एकजुट होकर एनडीए की सत्ता को चुनौती देने निकल पड़ी है। 2025 विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही दोनों दलों ने गांव-गरीब-किसान और पिछड़े तबकों के मुद्दों पर साझा रणनीति बनानी शुरू कर दी है।

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राजद के तेजस्वी यादव जहां युवा, बेरोजगारी और सामाजिक न्याय के मुद्दों को धार दे रहे हैं, वहीं भाकपा माले खेत, मजदूर और ज़मीन के सवालों को लेकर जन आंदोलनों की ज़मीन तैयार कर रही है। भोजपुर, सिवान, दरभंगा, और कटिहार जैसे इलाकों में दोनों दलों की संयुक्त जनसभाएं बताती हैं कि यह गठबंधन सिर्फ वोट नहीं, सत्ता की तैयारी में है।

तेजस्वी यादव जानते हैं कि भाजपा-जदयू की ताकत को तोड़ने के लिए उन्हें सिर्फ यादव-मुस्लिम समीकरण नहीं, बल्कि मजदूर-किसान-छात्रों की नब्ज भी पकड़नी होगी। और यही वो फील्ड है जहां भाकपा माले दशकों से मजबूत पकड़ रखती है।

यह गठबंधन ना केवल जातीय समीकरणों को पुनः परिभाषित कर रहा है, बल्कि सत्ता की राजनीति में वामपंथ की वापसी की दस्तक भी है। सवाल ये है कि क्या ये गठबंधन बिहार में सच में बदलाव ला पाएगा या फिर यह भी एक चुनावी जुगलबंदी बनकर रह जाएगा?

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