रांची की बेटी अनुष्का को दिया गया प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार,आसान नहीं रहा मिट्टी घर से राष्ट्रपति भवन तक सफर


रांची: कहते हैं कि मजबूत इरादे और अथक परिश्रम किसी भी अभाव को पीछे छोड़ सकते हैं। इस कथन को सच कर दिखाया है हजारीबाग आवासीय फुटबॉल प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षण प्राप्त कर रही होनहार महिला फुटबॉल खिलाड़ी अनुष्का कुमारी(Veer Bal Diwas 2025) ने। अनुष्का वही खिलाड़ी हैं, जिन्होंने हाल ही में भूटान में आयोजित सैफ अंडर-17 महिला फुटबॉल चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करते हुए छह मैचों में आठ गोल दागे थे और टूर्नामेंट की टॉप स्कोरर बनी थीं। अनुष्का का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। उनके पिता दिलेश मुंडा लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और काम करने में असमर्थ हैं। परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां पर है, जो खेती-बाड़ी करने के साथ-साथ सब्जी बेचकर घर चलाती हैं। दो भाइयों और एक बहन के बीच पली-बढ़ी अनुष्का ने बहुत कम उम्र में हालात को समझ लिया था। जहां गांव के बच्चे सामान्य खेलों में वक्त बिताते थे, वहीं अनुष्का के पैरों में हमेशा फुटबॉल रहता था। मैदान, सड़क और खाली जमीन हर जगह वह गेंद के पीछे दौड़ती नजर आती थी।
अनुष्का की जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आया, जब महज 11 साल की उम्र में उसका चयन हजारीबाग के रेजिडेंशियल गर्ल्स फुटबॉल ट्रेनिंग सेंटर में हुआ। घर से दूर जाना आसान नहीं था। मां की आंखें नम थीं, लेकिन उन्होंने बेटी के सपनों पर भरोसा किया। आज अनुष्का हजारीबाग के इसी आवासीय प्रशिक्षण केंद्र में नियमित प्रशिक्षण ले रही हैं। उसकी दिनचर्या सुबह चार बजे से शुरू होती है, कठोर अभ्यास, पढ़ाई और अनुशासन। चोट, थकान और मानसिक दबाव के बावजूद उसने कभी हार नहीं मानी।
लगातार अभ्यास के दम पर अनुष्का एक तेजतर्रार स्ट्राइकर के रूप में उभरी। स्कूल गेम्स से लेकर राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में उसने अपनी प्रतिभा साबित की। वह क्रिस्टियानो रोनाल्डो को अपना आदर्श मानती है, लेकिन मैदान पर उसकी अपनी अलग पहचान है। सैफ अंडर-17 चैंपियनशिप में उसका प्रदर्शन उसके करियर का अब तक का सबसे बड़ा अध्याय माना जा रहा है। इसके अलावा वह इंडियन एरोज वुमेन जूनियर्स टीम का भी हिस्सा रह चुकी है.अनुष्का से पहले ओरमांझी के सुदूवर्ती गांव चंदरा की दिव्यानी लिंडा भी भारतीय फुटबाल टीम में चयनित हो चुकी हैं। दिव्यानी की मां भी मजदूर हैं और वह रांची शहर में मजदूरी करने जाती हैं। दोनों बेटियों को राष्ट्रीय टीम में चयन होने के बाद सरकार की ओर से अंबेडकर आवास मिला है। अनुष्का के आवास निर्माण में पुराने अल्बेस्टर मकान की ईंट का भी उपयोग हो रहा है। संघर्ष से संबल तक की यात्रा का प्रतीक गरीबी, बीमारी व अभावों के बीच पली-बढ़ी अनुष्का की सफलता सिर्फ एक पुरस्कार नहीं, बल्कि हजारों बेटियों के लिए संदेश है, प्रतिभा हालात की मोहताज नहीं होती। ओरमांझी की यह बेटी आज देश की शान बन चुकी है।




