राजनीति का एक युग समाप्त: दिशोम गुरु शिबू सोरेन का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ नेमरा गांव में संपन्न, झारखंड की धरती रो पड़ी अपने माटी के सपूत को विदाई देते समय


नेमरा (दुमका):- झारखंड की राजनीति का एक युग समाप्त हो गया। झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक संरक्षक, पूर्व मुख्यमंत्री, वर्तमान राज्यसभा सांसद और जनजातीय चेतना के पुरोधा दिशोम गुरु शिबू सोरेन जी का 4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया, और 5 अगस्त को उनके पैतृक गांव नेमरा में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस ऐतिहासिक क्षण में जहां एक ओर राज्य की राजनीति के सबसे मजबूत स्तंभ ने विदा ली, वहीं दूसरी ओर लाखों की आंखें नम थीं, हजारों लोगों ने अपने नेत्रों से एक ऐसी यात्रा देखी जो झारखंड के माटी से शुरू होकर राष्ट्रीय राजनीति के शिखर तक पहुंची थी। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को इतनी भव्यता और गरिमा के साथ संपन्न किया गया कि यह झारखंड के इतिहास में अमिट रूप से दर्ज हो गया। अंतिम यात्रा में जनसैलाब इस तरह उमड़ा जैसे पूरा झारखंड दिशोम गुरु को अंतिम विदाई देने नेमरा गांव पहुंच गया हो। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, जो स्वयं दिवंगत नेता के पुत्र हैं, ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। यह दृश्य न केवल भावनात्मक था बल्कि पूरे झारखंड के लिए एक गहन संदेश भी — कि संघर्षशील आत्माएं अमर होती हैं।

दिशोम गुरु के अंतिम संस्कार में राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ-साथ झारखंड सरकार के तमाम वरिष्ठ मंत्रीगण, विधायकों, सांसदों, अधिकारियों, और देश के विभिन्न हिस्सों से आए जनजातीय प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि शिबू सोरेन केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में एक जनआंदोलन, एक चेतना और एक विचारधारा के रूप में स्थापित हो चुके थे। अंतिम यात्रा सुबह उनके आवास से प्रारंभ हुई, पारंपरिक जनजातीय वाद्ययंत्रों, ढोल-नगाड़ों और हजारों अनुयायियों के नारों के साथ। “दिशोम गुरु अमर रहें”, “गुरुजी संघर्ष का प्रतीक हैं” जैसे नारों से नेमरा की गलियाँ गूंज उठीं। उनके पार्थिव शरीर को एक विशेष रथ पर सजाया गया, जो चारों ओर से पुष्पों से ढंका हुआ था। इस रथ को युवाओं की टोली ने कंधे पर उठाकर अंतिम विश्राम स्थल तक पहुंचाया।
शिबू सोरेन का जीवन इतिहास की किताबों से कहीं बड़ा था। वे वह नेता थे जिन्होंने जमीन से जुड़कर राजनीति की, आदिवासी समाज को न केवल संगठित किया, बल्कि उसकी आवाज़ को दिल्ली के दरबारों तक पहुंचाया। बचपन में ही उनके मन में अन्याय के विरुद्ध लड़ाई का बीज पड़ा। फिर शुरू हुआ एक लंबा संघर्ष — जमींदारी प्रथा के खिलाफ, वन अधिनियमों के खिलाफ, खनन माफिया और सरकारी लापरवाही के खिलाफ। झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना के साथ उन्होंने आदिवासी अस्मिता को एक राजनैतिक मंच दिया, और धीरे-धीरे झारखंड राज्य के निर्माण का सपना साकार करने में वे सबसे अग्रणी चेहरा बन गए। झारखंड अलग राज्य आंदोलन का इतिहास अगर लिखा जाएगा तो शिबू सोरेन का नाम पहले पन्ने पर सुनहरे अक्षरों में होगा। उन्होंने जेल की सलाखों के पीछे भी समय बिताया, लेकिन उनके हौसले को कोई नहीं तोड़ पाया।
नेमरा गांव, जो सामान्य दिनों में एक शांत जनजातीय बस्ती की तरह लगता है, आज जनसैलाब से भर चुका था। गांव के हर कोने में तिरंगे, झामुमो के झंडे और गुरुजी की तस्वीरें लगी थीं। युवा कार्यकर्ताओं की टोली हर गली से होते हुए लोगों को अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए आमंत्रित कर रही थी। झारखंड के दूरदराज के इलाकों — संथाल परगना, कोल्हान, पलामू, दुमका, बोकारो, गिरिडीह, चाईबासा से हजारों की संख्या में लोग पहुंचे थे ।
अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया पारंपरिक जनजातीय विधि के अनुसार संपन्न हुई, साथ ही राज्य सरकार द्वारा पूरे राजकीय सम्मान की व्यवस्था की गई थी। झारखंड पुलिस के जवानों ने बंदूकों की सलामी दी, बैंड की धुनों के साथ भारत सरकार द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर प्रस्तुत किया गया। जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पिता को मुखाग्नि दी, तब पूरे वातावरण में एक गहन सन्नाटा छा गया — जैसे झारखंड की आत्मा कुछ पल के लिए थम गई हो। मुख्यमंत्री की आंखें नम थीं, लेकिन उनकी मुद्रा में दृढ़ता थी — जैसे वे अपने पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने की प्रतिज्ञा ले रहे हों। उन्होंने कहा, “गुरुजी केवल मेरे पिता नहीं थे, वे झारखंड की आत्मा थे। उन्होंने हमें लड़ना सिखाया, झुकना नहीं सिखाया। हम उनके रास्ते पर चलकर ही राज्य को आगे ले जाएंगे।”
नेमरा गांव में हजारों की भीड़ के लिए प्रशासन ने विशेष व्यवस्था की थी। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। मुख्यमंत्री सचिवालय, गृह विभाग, जिला प्रशासन, पुलिस और झामुमो कार्यकर्ताओं के समन्वय से यह आयोजन बेहद शांति और गरिमा के साथ संपन्न हुआ। नेमरा की मिट्टी में आज इतिहास लिखा गया — एक ऐसा इतिहास जिसे आने वाली पीढ़ियाँ गौरव से पढ़ेंगी।
दिशोम गुरु की अंतिम यात्रा के दौरान न केवल राजनेता बल्कि समाजसेवी, लेखक, पत्रकार, और कलाकार भी उनके योगदान को याद करते नजर आए। कई लोगों ने कहा कि आज झारखंड ने अपना असली सपूत खो दिया है, एक ऐसा नेता जो सत्ता में रहकर भी जमीनी कार्यकर्ता बना रहा। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि ईमानदारी, संघर्ष और सच्चे नेतृत्व के बल पर कोई भी व्यक्ति इतिहास रच सकता है।
अंतिम संस्कार के बाद नेमरा में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन भी किया गया, जिसमें देश के कोने-कोने से आए अतिथियों ने शिबू सोरेन जी के योगदान को याद किया। इस सभा में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, मंत्री बन्ना गुप्ता, मंत्री चंपई सोरेन, सांसद विजय हांसदा, विधायक स्टीफन मरांडी, झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य, और कई वरिष्ठ नेताओं ने मंच से भावभीनी श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर झारखंड के पारंपरिक आदिवासी नृत्य दलों ने गुरुजी को समर्पित नृत्य प्रस्तुत किया और लोकगीतों से वातावरण को और भी भावनात्मक बना दिया।
शिबू सोरेन भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका विचार, उनका संघर्ष, उनकी सोच और उनके आदर्श झारखंड की राजनीति, समाज और संस्कृति में सदैव जीवित रहेंगे। उनकी स्मृति में नेमरा गांव को एक स्मारक स्थल के रूप में विकसित करने की मांग भी स्थानीय लोगों और झामुमो कार्यकर्ताओं द्वारा की गई, ताकि आने वाली पीढ़ियों को यह बताया जा सके कि इस धरती पर एक ऐसा पुरुष भी जन्मा था जिसने अपने अधिकारों के लिए पूरी व्यवस्था को झुकने पर मजबूर कर दिया।
दिशोम गुरु को अंतिम विदाई देते समय नेमरा गांव की हवाओं में कुछ अलग ही भावनात्मक तरंगें थीं — जैसे पेड़ भी झुककर उन्हें नमन कर रहे हों, जैसे सूरज की किरणें भी मद्धम हो गई हों, जैसे धरती ने अपने सबसे प्रिय पुत्र को खो दिया हो। इस अंतिम यात्रा ने साबित कर दिया कि कोई भी नेता केवल पदों से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से महान बनता है। और शिबू सोरेन का जीवन इसका जीवंत प्रमाण है।



